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Showing posts from October, 2020

अनुभूति

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🌷 अनुभूति 🌷       हे री मैं तो प्रेम-दिवानी मेरो दरद न जाणै कोय.....      दरद की मारी बन बन डोलूं बैद मिल्यो नही कोय॥       ना मैं जानू आरती वन्दन, ना पूजा की रीत।        लिए री मैंने दो नैनो के दीपक लिए संजोये॥       घायल की गति घायल जाणै, जो कोई घायल होय।       जौहरि की गति जौहरी जाणै की जिन जौहर होय॥        सूली ऊपर सेज हमारी, सोवण किस बिध होय।       सुन मंडल मे सेज पिया की, मिलणा किस बिध होय।        दरद की मारी बन-बन डोलूं बैद मिल्या नहिं कोय।        मीरा की प्रभु पीर मिटेगी जद बैद सांवरिया होय॥         मेवाड़ की रानी मीराबाई संत शिरोयणी रविदास जी की शिष्या थी। उनकी सखि सहेलियाँ गुरु रविदास जी पर नाक-मुँह चढाती थी।  वे मीराबाई को ताने देती थी कि आप खुद शाही महलों में रहती हैं। पर आपके गुरु जूते गाँठकर बड़ी मुश्किल से गुज़ारा करते हैं।        मीराबाई को इस बात का बहुत दुख ह...

संत रविदास जी द्वारा सात 💯 पंडितों को शरण में लेना

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________________________________ तुम पण्डित किस भांतिके, बोलत है रैदास।    गरीबदास हरि हेतसैं, कीन्हा यज्ञ उपास।। यज्ञ दई रैदासकूं, षटदर्शन बैठाय।   गरीबदास बिंजन बहुत, नाना भांति कराय।। चमरा पंडित जीमहीं, एक पत्तल कै मांहि।   गरीबदास दीखै नहीं, कूदि कूदि पछतांहि।। रैदास भये है सात सै, मूढ पंडित गलखोडि।  गरीबदास उस यज्ञ में, बौहरि रही नहीं लोडि।। परे जनेऊ सात सै, काटी गल की फांस।  गरीबदास जहां सोने का, दिखलाया रैदास।। सूत सवामण टूटिया, काशी नगर मंझार।  गरीबदास रैदासकै, कनक जनेऊ सार।। पंडित शिष्य भये सात सै, उस काशी कै मांहि। गरीबदास चमार कै, भेष लगे सब पाय।। संत रविदास जी का जन्म चमार समुदाय में काशी नगर में हुआ। ये परमेश्वर कबीर जी के समकालीन हुए थे। परम भक्त रविदास जी अपना चर्मकार का कार्य किया करते थे। भक्ति भी करते थे। परमेश्वर कबीर जी ने काशी के प्रसिद्ध आचार्य स्वामी रामानन्द जी को यथार्थ भक्ति मार्ग समझाया था।      अपना सतलोक स्थान दिखाकर वापिस छोड़ा था। उससे पहले स्वामी रामानन्द जी केवल ब्राह्मण जाति के व्यक्तियों को ही...

कबीर साहिब जी द्वारा वैश्या काे शरण

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      बन्दी छोड़ कबीर साहिब जी द्वारा अनेकों अनहोनी लीलाएँ करने से प्रभावित होकर चौंसठ लाख शिष्य बने थे। परमेश्वर तो भूत भविष्य तथा वर्तमान की जानते हैं। उनको पता था कि ये सब चमत्कार देखकर तथा इनको मेरे आशीर्वाद से हुए भौतिक लाभों के कारण मेरी जय जयकार कर रहे हैं। इनको मुझ पर विश्वास नहीं है कि मैं परमात्मा हूँ। परंतु देखा-देखी कहते अवश्य हैं कि कबीर जी हमारे सद्गुरू जी तो स्वयं परमात्मा आए हैं।       अपने लाभ भी बताते थे। एक दिन कबीर साहिब जी ने शिष्यों की परीक्षा लेनी चाही कि देखूं तो कितने ज्ञान को समझे हैं। यदि इनको विश्वास ही नहीं है तो ये मोक्ष के अधिकारी नहीं हैं। ये तो मेरे सिर पर व्यर्थ का भार हैं। यह विचार करके एक योजना बनाई। अपने परम शिष्य रविदास से कहा कि एक हाथी किराए पर लाओ।       काशी नगर में एक सुंदर वैश्या थी। उसके मकान से थोड़ी दूरी पर किसी कबीर जी के भक्त का मकान था। कबीर जी उसके आँगन में रात्रि के समय सत्संग कर रहे थे। उस दिन उस वैश्या के पास भी ग्राहक नहीं थे।      सत्संग के वचन सुनने के लिए वह ...

आत्मा और अपने प्रभु का चिंतन

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     एक बार कबीर साहब जी से किसी ने पूछा कि आप दिनभर कपड़ा बुनते रहते हैं तो भगवान का समरण कब करतें हैं ? कबीर साहब जी ने उस व्यक्ति को लेकर अपनी झोपड़ी से बाहर आ गए। बोले, यहां खड़े रहो। तुम्हारे सवाल का जवाब सीधे न देकर, मैं उसे दिखा सकता हूं।      कबीर साहब जी ने दिखाया कि एक औरत पानी की गागर सिर पर रखकर लौट रही थीं। उसके चेहरे पर प्रसन्नता और चाल में रफ्तार थीं। उमंग से भरी हुई वह नाचती हुई-सी चलीं जा रहीं थीं। गागर को उसने पकड़ नहीं रखा था, फिर भी वह पूरी तरह संभली हुई थीं।      कबीर साहब जी ने कहा कि उस औरत को देखो। वह जरूर कोई गीत गुनगुना रही है। शायद कोई प्रियजन घर आया होगा। वह प्यासा होगा, उसके लिएं वह पानी लेकर जा रही है। मैं तुमसे जानना चाहता हूं कि उसे गागर की याद होंगी या नहीं।        कबीर साहब जी की बात सुनकर उस व्यक्ति ने जवाब दिया कि उसे गागर की याद नहीं होती तो अब तक तो गागर नीचे ही गिर चुकीं होती। कबीर साहब जी बोलें कि यह साधारण सी औरत सिर पर गागर रखकर रास्ता पार करतीं है। मजे से गीत गाती है, फिर भी गागर ...