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Showing posts from September, 2020

नरक लोक का वर्णन

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गरीब, जम किंकर के धाम कूं, साईं न ले जाय।            बड़ी भयंकर मार है, सतगुरु करै सहाय  गरीब, कारे कारे किंगरे, नीला जम का धाम ।           जेते जामे जीव है, नहीं चैन विश्राम । गरीब, है तांबे की धरतरी, चोरासी मध कुंड ।         आदि अंत के जिव जित, होते रुंडक मुंड। गरीब, चोरासी जहाँ कुंड हैं, खंभ अनंत अपार।          करनी भुगते आपनी, नाना बिधि की मार। गरीब, चोदा कोटि भयंकरम, चोदा मुनि दिवान।           कोटि कोटि ताबै किये, साईं का फुरमान। गरीब, रुधिर भरे जहाँ कुंड हैं, कुंभी जिनका नाम           द्वारा हैं मुख लोड का, बड़ा भयंकर धाम। गरीब, सो सो योजन कुंड है, गिरद गता बहु भीर।            कोट्यो जिव उसारिये, कहिं न पावै थीर । गरीब, हाथ पैर जिनके नहीं, नहीं सीस मुखद्वार।            तलछू माछू होत हैं, परै गैब की मार। गरीब, लघुसी बानी कहत हूँ, दीरघ कही न जाय। ...

अजामेल के उद्धार की कथा

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#MuktiBodh_Part23 हम पढ़ रहे हैं मुक्तिबोध पेज नंबर (46-47) ‘‘अजामेल के उद्धार की कथा’’ काशी शहर में एक अजामेल नामक ब्राह्मण शराब पीता था। वैश्या के पास जाता था। वैश्या का नाम मैनका था, बहुत सुंदर थी। परिवार तथा समाज के समझाने पर भी अजामेल नहीं माना तो उन दोनों को नगर से निकाल दिया। वे उसी शहर से एक मील दूर वन में कु टिया बनाकर रहने लगे। दोनों ने विवाह कर लिया। अजामेल स्वयं शराब तैयार करता था। जंगल से जानवर मारकर लाए और मौज-मस्ती करता था। विशेष :- अजामेल पूर्व जन्म में विष्णु जी का परम भक्त था। ब्रह्मचर्य का पूर्ण पालन करता था। साधक समाज में पूरी इज्जत थी। बचपन से ही घर त्यागकर साधुओं में रहता था। वैश्या भी पूर्व जन्म में विष्णु जी की परम भक्त थी। ब्रह्मचर्य का पूर्ण पालन करती थी। पर पुरूष की ओर कभी दोष दृष्टि से नहीं देखती थी। इस लक्षण से साधक समाज में विशेष सम्मान था। साधकों में ध्यान समाधि लगाने का विशेष प्रचलन है जो केवल काल प्रेरणा है। हठ योग है जो गीता तथा वेदों में मना किया है। एक दिन श्याम सुंदर (अजामेल का पूर्व जन्म का नाम) लेटकर समाधि लगाए हुए था। शरीर पर केवल एक ...

लख चौरासी की धारा

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लख चौरासी योनियाँ

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पराशर ऋषी की जीवनी

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   पराशर एक मन्त्रद्रष्टा ऋषि, शास्त्रवेत्ता, ब्रह्मज्ञानी एवं स्मृतिकार है। येे महर्षि वसिष्ठ के पौत्र, गोत्रप्रवर्तक, वैदिक सूक्तों के द्रष्टा और ग्रंथकार भी हैं। पराशर शर शय्या पर पड़े भीष्म से मिलने गये थे। परीक्षित् के प्रायोपवेश के समय उपस्थित कई ऋषि-मुनियों में वे भी थे। वे छब्बीसवें द्वापर के व्यास थे।    ऋग्वेद के मंत्रदृष्टा और गायत्री मंत्र के महान साधक सप्त ऋषियों में से एक महर्षि वशिष्ठ के पौत्र महान वेदज्ञ, ज्योतिषाचार्य, स्मृतिकार एवं ब्रह्मज्ञानी ऋषि पराशर के पिता का नाम शक्तिमुनि और माता का नाम अद्यश्यंती था। ऋषि पराशर ने निषादाज की कन्या सत्यवती के साथ उसकी कुंआरी अवस्था में समागम किया था जिसके चलते 'महाभारत' के लेखक वेदव्यास का जन्म हुआ। सत्यवती ने बाद में राजा शांतनु से विवाह किया था।        पराशर बाष्कल और याज्ञवल्क्य के शिष्य थे। पराशर ऋषि के पिता को राक्षस कल्माषपाद ने खा लिया था। जब यह बात पराशर ऋषि को पता चली तो उन्होंने राक्षसों के समूल नाश हेतु राक्षस सत्र यज्ञ प्रारंभ किया जिसमें एक के बाद एक राक्षस खिंचे चले आकर उसमें ...

कबीर साहिब ही परमात्मा है

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शेख फरीद

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कागभुसण्ड

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अड़सठ तीर्थ

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कबीर , मात पिता मिल जायेंगे , लाख चौरासी माहीं ।            सतगुरू सेवा बन्दगी , फिर मिलन की नाहीं ।।       मात पिता हमारे इस जन्म के जन्मदाता है। हम मात पिता के बगैर इस संसार में नही आ सकते। मात पिता आदरणीय होते है। हर संतान का कर्तव्य है वो भी अपने मात पिता का आदर करे। उनकी सेवा ऐसे करे जैसे यह परमात्मा ने हमें सेवा दी हो। खुद भी पुर्ण संत से भक्ति ग्रहण करे और अपने परिवार को भी भक्ति दिलाये।          फिर भी मात पिता की सेवा भक्ति में हम श्रवण कुमार जितनी बराबरी नही कर सकते।श्रवण कुमार का वध राजा दशरथ से भूलवश हो गया था। जिस कारण इनके माता पिता ने राजा दशरथ को पुत्र वियोग का शाप दे दिया था।      इसी के फलस्वरूप राम को वनवास हुआ और राजा दशरथ ने पुत्र वियोग में राम को याद करते हुए प्राण त्यागे श्रवण अथवा श्रवण कुमार संस्कृत काव्य रामायण के एक पात्र का नाम है। इसमें श्रवण की उल्लेखनीयता उसकी अपने माता-पिता की भक्ति के कारण है।      जब श्रवण कुमार पर विपदा आयी तो मात पिता भी टाल ना सके जबकी...

सतज्ञान बिना मानव जीवन अधूरा!

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जिसकी जैसी भावना, उसको वैसा ही फल मिलता है। बिना सतज्ञान के मनुष्य अपना कर्म बिगाड़ लेता है। ज्ञान वाणी - किसी गाँव में एक साधु रहता था जो दिन भर लोगों को उपदेश दिया करता था। उसी गाँव में एक नर्तकी थी, जो लोगों के सामने नाचकर उनका मन बहलाया करती थी। अक्सर मंदिर के घंटी की तरफ आवाज सुनकर नर्तकी प्रभु के दर्शन को मन में सोचती थी वहीं साधु नर्तकी के घर से आने वाले ढोल हारमोनियम की आवाज़ को सुनकर सोचता की काश मैं भी नर्तकी का नाच देख पाता ! लेकिन समाज के डर से दोनों की इच्छा बस इच्छा ही रह गयी। एक दिन गाँव मेँ बाढ़ आ गयी और दोनों एक साथ ही मर गये। मरने के बाद जब ये दोनों यमलोक पहुँचें तो इनके कर्मों और उनके पीछे छिपी भावनाओं के आधार पर इन्हें स्वर्ग या नरक दिये जाने की बात कही गई। साधु खुद को स्वर्ग मिलने को लेकर पुरा आश्वस्त था। वहीं नर्तकी अपने मन में ऐसा कुछ भी विचार नहीं कर रही थी। नर्तकी को सिर्फ फैसले का इंतजार था। तभी घोषणा हूई कि साधु को नरक और नर्तकी को स्वर्ग दिया जाता है। इस फैसले को सुनकर साधु गुस्से से यमराज पर चिल्लाया और क्रोधित होकर पूछा , “यह कैसा न्याय है महाराज?, मैँ जीवन ...

अंत समय मे आत्मा !

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      जब मनुष्य कुछ सांसो का जीवन शेष रह जाता है तो मनुष्य को यमदुत दिखाई देने लग जाते है। मनुष्य का दम धुटने लग जाता है। यमदुत आत्मा को यातना देते है कि वो शरीर छोड कर बहार आ जाये। उसके शरीर मे भाले तक चुभाये जाते है तब कही आत्मा शरीर छोडकर बहार आती है। जब शरीर छोड़ती है तो मनुष्य को पहले ही पता चल जाता है। वो स्वयं भी हथियार डाल देता है अन्यथा उसने आत्मा को शरीर में बनाये रखने का भरसक प्रयत्न किया होता है और इस चक्कर में कष्ट को झेला होता है ।      यदि उस व्यक्ति ने पुर्ण संत को गुरू बनाया है और उस संत द्वारा दिया नाम उपदेश कर रहा होता है तो यमदुत उस आत्मा के पास नही आते। एसी स्थिति जब बनती है जब पहले से ही नाम सुमरण का अभ्यास उस आत्मा ने कर रखा होता है। उस स्थिति मे उसके गुरू के रुप मे उसका इष्ट आता है जिसकी वो भगति कर रहा होता है।     अब उसके सामने उसके सारे जीवन की यात्रा चल-चित्र की तरह चल रही होती है। उधर आत्मा शरीर से निकलने की तैयारी कर रही होती है इसलिये शरीर के पाँच प्राण एक 'धनंजय प्राण' को छोड़कर शरीर से बाहर निकलना आरम्भ कर देते हैं।...

जीवा-तत्वा!(दता)

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||| एक सूखी डाली से कैसे बना विशालकाय वट वृक्ष ||| गुजरात प्रान्त में भरूच शहर के पास एक अंकलेश्वर गांव है। उसके पास “शुक्ल तीर्थ” नाम का गांव था जिसमें ब्राह्मण जाति के लोग निवास करते थे। वर्तमान में वहां गांव नहीं है क्योंकि नर्मदा नदी ने इसको चारों ओर से घेर कर अंकलेश्वर गांव से सम्पर्क समाप्त कर दिया। जिस कारण से वहां जाने के लिए नौका का प्रयोग होने लगा और गांव कहीं ओर स्थान पर जा बसा। उस समय वि.सं. 1465 (सन 1408) में इस शुक्ल तीर्थ गांव में दो भाई ब्राह्मण सगे भाई रहते थे। जिनमें से बड़े का नाम जीवा तथा छोटे का नाम तत्वा(दता) थे। जीवा को एक लड़की संतान रुप में प्राप्त थी और तत्वा को एक लड़का था। जीवा तथा तत्वा प्रभु प्रेमी आत्माऐं थी, इनको सत्संग से पता चला कि गुरु के बिना मोक्ष नहीं हो सकता। फिर यह भी निश्चय हुआ कि पूर्ण गुरु के बिना मोक्ष नहीं हो सकता है। दोनों भाइयों ने बहुत सत्संग ऋषि-मण्डलेश्वरों के सुनें। जिस भी संत का सत्संग सुनते थे तो लगता था कि यह पूर्ण गुरु है। फिर अन्य का सत्संग सुनते थे तो लगता था कि यह पूर्ण गुरु है। दोनों ने विचार किया कि पूर्ण गुरु की पहचान कैसे कर...

सृष्टि रचना :- Part -4

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‘‘तीनों गुण क्या हैं? प्रमाण सहित‘‘ ‘‘तीनों गुण रजगुण ब्रह्मा जी, सतगुण विष्णु जी, तमगुण शिव जी हैं। ब्रह्म (काल) तथा प्रकृति (दुर्गा) से उत्पन्न हुए हैं तथा तीनों नाशवान हैं‘‘ प्रमाण :- गीताप्रैस गोरखपुर से प्रकाशित श्री शिव महापुराण जिसके सम्पादक हैं श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार पृष्ठ सं. 24 से 26 विद्यवेश्वर संहिता तथा पृष्ठ 110 अध्याय 9 रूद्र संहिता ‘‘इस प्रकार ब्रह्मा-विष्णु तथा शिव तीनों देवताओं में गुण हैं, परन्तु शिव (ब्रह्म-काल) गुणातीत कहा गया है। दूसरा प्रमाण :- गीताप्रैस गोरखपुर से प्रकाशित श्रीमद् देवीभागवत पुराण जिसके सम्पादक हैं श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार चिमन लाल गोस्वामी, तीसरा स्कंद, अध्याय 5 पृष्ठ 123 - भगवान विष्णु ने दुर्गा की स्तूति की : कहा कि मैं (विष्णु), ब्रह्मा तथा शंकर तुम्हारी कृपा से विद्यमान हैं। हमारा तो आविर्भाव (जन्म) तथा तिरोभाव (मृत्यु) होती है। हम नित्य (अविनाशी) नहीं हैं। तुम ही नित्य हो, जगत् जननी हो, प्रकृति और सनातनी देवी हो। भगवान शंकर ने कहा : यदि भगवान ब्रह्मा तथा भगवान विष्णु तुम्हीं से उत्पन्न हुए हैं तो उनके बाद उत्पन्न होने वाला मैं तमोगुणी...

MuktiBodh_Part - 33

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        हम पढ़ रहे हैं मुक्तिबोध पृष्ठ नंबर (63-64) शिवजी ने पार्वती जी को मंत्रों की जानकारी दी और कमलों के बारे में बताया तब तक पार्वती जी हां हूं हां कर रही थी। उसके बाद पार्वती जी को नींद आ गई। बाद में वह गंदा (खराब) अण्डा स्वस्थ होकर उसमें तोते का बच्चा बन गया और हाँ-हाँ करने लगा। आवाज में अंतर जानकर शिव जी ने पार्वती की ओर देखा तो वह तो समाधि में थी। अंतर दृष्टि से देखा तो एक तोता सर्व ज्ञान सुन चुका था। शिव जी उस तोते को मारने के लिए उठे तो वह तोता उड़ चला। शिव जी भी आकाश मार्ग से उसका पीछा करने लगे। वेदव्यास ऋषि जी की पत्नी ने जम्भाई ली तो उसके मुख के द्वारा तोते वाला जीव उस ऋषि की पत्नी के शरीर में गर्भ में चला गया। तोते वाला शरीर वहीं त्याग दिया। शिव जी सब देख रहे थे। शिव जी ने वेदव्यास जी की पत्नी से कहा कि आपके गर्भ में मेरे ज्ञान व भक्ति मंत्र का चोर है। उसने अमर कथा सुन ली है। वह भी अमर हो गया है। (जितना अमरत्व उस मंत्र से होता है) व्यास जी भी वहीं आ गए तथा शिव जी को प्रणाम किया। आने का कारण जाना तो कहा कि हे भोलेनाथ! आप कह रहे हो कि वह अमर हो गया है। य...

गुरू निष्ठा

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       कबीरा,  ते नर अंध है, जो गुरुको कहते और।                   हरी रूठे गुरु ठौर है, गुरु रुठे नहीं ठौर।।      कबीरा,  आप ही थगाईये, और ठगीये ना कोय,                   आप ठगे सुख होत है, और ठगे दूख होय।।      प्राचीन काल में गोदावरी नदी के किनारे वेद धर्म मुनि के आश्रम में उनके शिष्य वेद शास्त्रादि का अध्ययन करते थे। एक दिन गुरु ने अपने शिष्यों की गुरुभक्ति की परीक्षा लेने का विचार किया।       सभी शिष्यों में गुरु के प्रति इतनी अटूट श्रद्धा होती है कि उस श्रद्धा को नापने के लिए गुरुओं को कभी कभी योगबल का भी उपयोग करना पड़ता है। वेद धर्म मुनि ने शिष्यों से कहा कि हे शिष्यो ! अब प्रारब्धवश मुझे कोढ़ निकलेगा। मैं अंधा हो जाऊगां इसलिए काशी में जाकर रहूँगा।        आप सब मे कोई मेरे साथ काशी जाकर रहे और मेरी अंतिम समय मे कोई सेवा कर सके। शिष्यों मे सनाटा छा गया। मुनी जी ने कहा कि हे शिष्यों! पहले तो कहा...