अड़सठ तीर्थ
कबीर , मात पिता मिल जायेंगे , लाख चौरासी माहीं ।
सतगुरू सेवा बन्दगी , फिर मिलन की नाहीं ।।
मात पिता हमारे इस जन्म के जन्मदाता है। हम मात पिता के बगैर इस संसार में नही आ सकते। मात पिता आदरणीय होते है। हर संतान का कर्तव्य है वो भी अपने मात पिता का आदर करे। उनकी सेवा ऐसे करे जैसे यह परमात्मा ने हमें सेवा दी हो। खुद भी पुर्ण संत से भक्ति ग्रहण करे और अपने परिवार को भी भक्ति दिलाये।
फिर भी मात पिता की सेवा भक्ति में हम श्रवण कुमार जितनी बराबरी नही कर सकते।श्रवण कुमार का वध राजा दशरथ से भूलवश हो गया था। जिस कारण इनके माता पिता ने राजा दशरथ को पुत्र वियोग का शाप दे दिया था।
इसी के फलस्वरूप राम को वनवास हुआ और राजा दशरथ ने पुत्र वियोग में राम को याद करते हुए प्राण त्यागे श्रवण अथवा श्रवण कुमार संस्कृत काव्य रामायण के एक पात्र का नाम है। इसमें श्रवण की उल्लेखनीयता उसकी अपने माता-पिता की भक्ति के कारण है।
जब श्रवण कुमार पर विपदा आयी तो मात पिता भी टाल ना सके जबकी राजा दशरथ तो प्रजा की रक्षार्थ हिंसक नरभक्षी सिंह को मारने आये थे और गलति से श्रवण मारा गया और श्रवण के वियोग में उसके माता पिता ने श्रवण के साथ ही आत्मदाह किया।
सेवा भाव से आये राजा दशरथ को भी श्राप दे दिया कि जिस तरह हम पुत्र वियोग में मर रहे है तुम भी अपने पुत्र वियोग में मरोगे। श्रवण कुमार अपने माता-पिता के मोक्ष के लिये दन्तकथा अनुसार अड़सठ तीर्थयात्रा पर ले जा रहे थे।मात पिता अन्धे थे। क्या मिला मात पिता को। यदि सद्भक्ति करते और अपने पुत्र श्रवण से भी करते तो मोक्ष होता।
तीर्थ यात्रा पर जाने से यदि कुछ थोडा बहुत लाभ भी मिला होगा तो राजा दशरथ को श्राप देकर खत्म कर लिया। पुत्र खोया, प्राण गंवाये।
अडसठ तीर्थ भर्म भर्म आवे,सो फल गुरू के चरणा पावे।
कबीर साहिब जी कहते हैं कि अड़सठ तीर्थयात्रा जितना फल तो एक फल सतगुरू की सेवा करने से ही मिल जाता है। अड़सठ तीर्थयात्रा पर जाने से कितने जीव मरते है उनका भी पाप लगेगा। जिस जल मे आप स्नान करोगे उसमे सुक्षम जीव बहुत है। वो भी मारे जायेगे। उसका भी पाप लगेगा।
गरीब , उत्तर दक्षिण पूरब पश्चिम , फिरता दाने दाने नू ।
सर्व कला सतगुरू साहेब की , हरि आये हरियाणे नू ।।
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सत साहिब जी
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