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Showing posts from August, 2020

भीष्म_पितामह

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  रणभूमि में शरशैया पर पड़े थे। हल्का सा भी हिलते तो शरीर में घुसे बाण भारी वेदना के साथ रक्त की पिचकारी सी छोड़ देते। ऐसी दशा में उनसे मिलने सभी आ जा रहे थे। #श्री_कृष्ण भी दर्शनार्थ आये। उनको देखकर भीष्म जोर से हँसे और कहा.... आइये #जगन्नाथ।.. आप तो सर्व ज्ञाता हैं। सब जानते हैं, बताइए मैंने ऐसा क्या पाप किया था जिसका दंड इतना भयावह मिला? कृष्ण: पितामह! आपके पास वह शक्ति है, जिससे आप अपने पूर्व जन्म देख सकते हैं। आप स्वयं ही देख लेते। भीष्म: देवकी नंदन! मैं यहाँ अकेला पड़ा और कर ही क्या रहा हूँ? मैंने सब देख लिया ...अभी तक 100 #जन्म देख चुका हूँ। मैंने उन 100 जन्मो में एक भी कर्म ऐसा नहीं किया जिसका परिणाम ये हो कि मेरा पूरा शरीर बिंधा पड़ा है, हर आने वाला क्षण ...और पीड़ा लेकर आता है। कृष्ण: पितामह ! आप एक भव और पीछे जाएँ, आपको उत्तर मिल जायेगा। भीष्म ने ध्यान लगाया और देखा कि 101 भव(शरीर) पूर्व वो एक नगर के राजा थे। ...एक मार्ग से अपनी सैनिकों की एक टुकड़ी के साथ कहीं जा रहे थे। एक सैनिक दौड़ता हुआ आया और बोला "राजन! मार्ग में एक #सर्प पड़ा है। यदि हमारी टुकड़ी उसके ऊपर से गुज...

जैसा खाये अन्न वैसा होए मन

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.                             एक दिन एक राजा जंगल में शिकार खेलने गया। जानवरों का पीछा करते करते राजा बहुत दुर निकल गया। वहा पर राजा को एक महात्मा मिल गये। महात्मा बड़े ही शांत, सोम्य और तपस्वी स्वभाव के योगी थे। कुछ समय महात्मा के संग में रहने से राजा को बड़ी प्रसन्नता हुई।       राजा ने सोचा कि इनके सानिध्य में रहने मात्र से इतने आनंद और प्रसन्नता होती है। अतः कुछ दिन के लिए इन्हें राजमहल में रखना चाहिए। ऐसा विचार करके राजा ने महात्माजी से राजमहल चलने के लिए आग्रह किया।लेकिन महात्माजी ने मना कर दिया ।      राजा को तो एक ही सनक सवार थी कि कैसे भी करके महात्माजी जी को राजमहल ले जाना है। राजा ने कहा कि हे महाराज ! हमारे नगर में लोगों का आग्रह है कि उन्हें किसी उच्च कोटि के विद्वान महात्मा से प्रवचन सुनने का सौभाग्य प्राप्त हो । इसी हेतु से मैं आपके पास आया हूँ। अतः कृपा करके मेरे साथ चलिए। लोककल्याण की बात सुनकर महात्माजी चलने के लिए तैयार हो गये ।       राजमहल पहुँच...

मार्कडेंय ऋषि

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🌍 *बंधे से बंधा मिले,छुटे कोंन उपाय ! कर सेवा निर्बंध की जो पल में ले छुड़ाय!!🥀👇👇 मार्कडेंय ऋषि को जब यह पता चला कि बह्मा विष्णु शिव से ज्यादा लाभ इनका पिता बह्म दे सकता है तो उसने सब दुनिया दारी छोडकर बंगाल की खाडी मे एक टापू (अंडमान निकोबार श्रैत्र) पर समाधिस्थ  होकर ऊं ऊं का उचारण कर के तप कर रहा था इसकी कसक देखकर इन्द्र की सिट्टी पिट्टी गुम हो गयी अगर किसी ने इन्द्र  के राज के बराबर भक्ति , यज्ञ कर लिया तो नियमानुसार इन्द्र को सिंहासन त्यागना पडता है मार्कण्डेय ऋषि जब तपस्या करने लगे तो इंद्र को फिर से अपना सिंहासन खतरे में नजर आया। तब उन्होंने मार्कण्डेय की तपस्या भंग करने के लिए उर्वशी भेजा उर्वशी तपस्या स्थल पर पहुंच गई और उसने अपनी सिद्धि शक्ति से सुहावना मौसम बनाया तथा हर तरह का कामुक नृत्य और गान किया लेकिन मार्कण्डेय ऋषि टस से मस नहीं हुए। कहते हैं कि तब अंत में उर्वशी को निर्वस्त्र होना पड़ा। फिर मार्कण्डेय ऋषि ने अपनी आंखें खोलकर कहा कि हे देवी! आप यहां किसलिए आई?     इस पर उर्वशी ने कहा कि हे ऋषि। आप जीत गए मैं हार गई। आप टस से मस नहीं हुए। आप सचमुच ...

गरुड बोध सागर

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नानक जी की कलयुग से वार्तालाप

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नाम दा फल

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सृष्टिकर्ता कबीर साहिब

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पंडित सर्वानन्द

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        एक बार सर्वानंद नाम का एक बड़ा विद्वान पंडित था उसने शास्त्रार्थ में सभी विद्वानों को हरा दीया ओर अपनी माँ शारदा के पास आया ओर बोला मा मैने सबको ज्ञान में हरा दीया मेरे समान इस पृथ्वी पर अब कोई विद्वान नही है इसलिये आप आज से मेरा नाम सर्वानंद से बदलकर सर्वजीत रख दो।        सर्वानंद‌ की मां‌ को शरीर में‌ भंयकर दर्द रहता था उसने तरह तरह के ईलाज करवा लिये पर कोई आराम नही मिला एक दिन उसने कबीर साहब का सत्संग एक बहन से सुना और वह भी सत्संग में पहुंच गयी सत्संग के समाप्त मे वो कबीर साहब को अपने‌ कष्ट के लिये प्रार्थना करने गयी उसने पहले चरण स्पर्श किये जैसे ही कबीर परमेश्वर ने उस पर आशीर्वाद का हाथ रखा वो कष्ट शरीर से छूमंतर हो गया यह समझ शारदा समझ गयी यह कोई परम शक्ति ही है ।      अब शारदा को पता था कि स्वयं पूर्ण ब्रह्म कबीर जी के रूप में कांशी में आए हुए है इसलिए शारदा कहती है। बेटा कांशी में एक कबीर नाम का संत है तू उसको ज्ञान चर्चा में हरा देना फिर में तेरा नाम सर्वजीत रख दूंगी। सुन मै ऐसे यकीन नही करूंगी। आप कबीर जी से लिखित ...

सुखदेव की उत्पत्ति की कथा

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मार्कडेंय ऋषि

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      एक समय बंगाल की खाड़ी के एक टापू अंडेमान में मार्कण्डेय ऋषि तप कर रहा था। इन्द्र के पद पर विराजमान आत्मा को यह शर्त होती है कि यदि उसके शासनकाल में 72 चैकड़ी युग के दौरान यदि पृथ्वी पर कोई व्यक्ति इन्द्र पद प्राप्त करने योग्य तप या धर्मयज्ञ कर लेता है और उसकी क्रिया में कोई बाधा नहीं आती है तो उस साधक को इन्द्र का पद दे दिया जाता है और वर्तमान इन्द्र से वह पद छीन लिया जाता है।      इसलिए जहाँ तक संभव होता है, इन्द्र अपने शासन काल में किसी साधक का तप या धर्मयज्ञ पूर्ण नहीं होने देता। उसकी साधना भंग करा देता है, चाहे कुछ भी करना पड़े। जब इन्द्र को उसके दूतों ने बताया कि बंगाल की खाड़ी में मार्कण्डेय नामक ऋषि तप कर रहे हैं। इन्द्र ने मार्कण्डेय ऋषि का तप भंग करने के लिए उर्वसी इन्द्र की पत्नी भेजी। सर्व श्रृगांर करके देवपरी मार्कण्डेय ऋषि के सामने नाचने-गाने लगी।      अपनी सिद्धि से उस स्थान पर बसंत ऋतु जैसा वातावरण बना दिया। मार्कण्डेय ऋषि ने कोई उत्सुकता नहीं दिखाई। उर्वसी ने कमर का नाड़ा तोड़ दिया, निःवस्त्रा हो गई। तब मार्कण्डेय ऋषि बोले, हे...

धन पुत्र वही जो परमार्थ में लगे

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                🌹        🌹 ____________________________     *एक सेठ बड़ा साधु सेवी था। जो भी सन्त महात्मा नगर में आते वह उन्हें अपने घर बुला कर उनकी सेवा करता। एक बार एक महात्मा जी सेठ के घर आये। सेठानी महात्मा जी को भोजन कराने लगी। सेठ जी उस समय किसी काम से बाज़ार चले गये।* *भोजन करते करते महात्मा जी ने स्वाभाविक ही सेठानी से कुछ प्रश्न किये। पहला प्रश्न यह था कि तुम्हारा बच्चे कितने हैं ? सेठानी ने उत्तर दिया कि ईश्वर की कृपा से चार बच्चे हैं।*धन पुत्र वही जो परमार्थ में लगे *महात्मा जी ने दूसरा प्रश्न किया कि तुम्हारा धन कितना है? उत्तर मिला कि महाराज! ईश्वर की अति कृपा है लोग हमें लखपति कहते हैं। महात्मा जी जब भोजन कर चुके तो सेठ जी भी बाज़ार से वापिस आ गये और सेठ जी महात्मा जी को विदा करने के लिये साथ चल दिये। मार्ग में महात्मा जी ने वही प्रश्न सेठ से भी किये जो उन्होंने सेठानी से किये थे। पहला प्रश्न था कि तुम्हारे बच्चे कितने हैं? सेठ जी ने कहा महाराज! मेरा एक पुत्र है। महात्मा जी दिल में सोचने लगे कि ऐसा लगता ह...

तम्बाकू सेवन तो दूर हाथ तक नहीं लगाते।

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चर्चा मस्तनाथ व गरीबदास जी

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कबीर सतलोक गमन स्थल मगहर

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अन्तिम निर्णय ईश्वर करता है

जंगल में एक गर्भवती हिरनी बच्चे को जन्म देने को थी। वो एकांत जगह की तलाश में घुम रही थी, कि उसे नदी किनारे ऊँची और घनी घास दिखी। उसे वो उपयुक्त स्थान लगा शिशु को जन्म देने के लिये। . वहां पहुँचते  ही उसे प्रसव पीडा शुरू हो गयी। उसी समय आसमान में घनघोर बादल वर्षा को आतुर हो उठे और बिजली कडकने लगी। उसने दाये देखा, तो एक शिकारी तीर का निशाना, उस की तरफ साध रहा था। घबराकर वह दाहिने मुडी, तो वहां एक भूखा शेर, झपटने को तैयार बैठा था। सामने सूखी घास आग पकड चुकी थी और पीछे मुडी, तो नदी में जल बहुत था। मादा हिरनी क्या करती ? वह प्रसव पीडा से व्याकुल थी। अब क्या होगा ? क्या हिरनी जीवित बचेगी ? क्या वो अपने शावक को जन्म दे पायेगी ? क्या शावक जीवित रहेगा ?  क्या जंगल की आग सब कुछ जला देगी ? क्या मादा हिरनी शिकारी के तीर से बच पायेगी ?क्या मादा हिरनी भूखे शेर का भोजन बनेगी ? वो एक तरफ आग से घिरी है और पीछे नदी है। क्या करेगी वो ? हिरनी अपने आप को शून्य में छोड, अपने बच्चे को जन्म देने में लग गयी। कुदरत का कारिष्मा देखिये। बिजली चमकी और तीर छोडते हुए, शिकारी की आँखे चौंधिया गयी। उसका तीर हि...