पंडित सर्वानन्द


        एक बार सर्वानंद नाम का एक बड़ा विद्वान पंडित था उसने शास्त्रार्थ में सभी विद्वानों को हरा दीया ओर अपनी माँ शारदा के पास आया ओर बोला मा मैने सबको ज्ञान में हरा दीया मेरे समान इस पृथ्वी पर अब कोई विद्वान नही है इसलिये आप आज से मेरा नाम सर्वानंद से बदलकर सर्वजीत रख दो।

       सर्वानंद‌ की मां‌ को शरीर में‌ भंयकर दर्द रहता था उसने तरह तरह के ईलाज करवा लिये पर कोई आराम नही मिला एक दिन उसने कबीर साहब का सत्संग एक बहन से सुना और वह भी सत्संग में पहुंच गयी सत्संग के समाप्त मे वो कबीर साहब को अपने‌ कष्ट के लिये प्रार्थना करने गयी उसने पहले चरण स्पर्श किये जैसे ही कबीर परमेश्वर ने उस पर आशीर्वाद का हाथ रखा वो कष्ट शरीर से छूमंतर हो गया यह समझ शारदा समझ गयी यह कोई परम शक्ति ही है ।

     अब शारदा को पता था कि स्वयं पूर्ण ब्रह्म कबीर जी के रूप में कांशी में आए हुए है इसलिए शारदा कहती है। बेटा कांशी में एक कबीर नाम का संत है तू उसको ज्ञान चर्चा में हरा देना फिर में तेरा नाम सर्वजीत रख दूंगी। सुन मै ऐसे यकीन नही करूंगी। आप कबीर जी से लिखित में लेकर आना की आप जीत गए। 

      अब सर्वानंद गीता चारो वेद आदि आदि सभी धार्मिक पुस्तको को एक बैलगाड़ी में भरता है। और चल पड़ता है काशी की तरफ।  सर्वानंद को कांशी में पहुचते पहुचते बहुत जोर की प्यास लग जाती है। ऐसी हालत हो जाती है कि अगर कुछ देर ओर पानी नही मिला तो मानो प्राण निकल जाएंगे।

     तभी सर्वानंद को सामने एक लड़की  कुए पर पानी भरती नजर आती है। जो कबीर परमात्मा की धर्म पुत्री कमाली थी। जिसे कबीर परमात्मा ने कब्र से निकाल कर सबके सामने जिंदा किया था। अब सर्वानंद कमाली के पास जाता है। कहता है कि बहन मुझे जल्दी से पानी पिला दो। कमाली कहती है पण्डित जी पानी पीने से पहले मेरी बात सुनो लेकिन सर्वानंद कहता है कि मेरे प्राण जाने वाले है। आप पहले मुझे थोड़ा सा पानी पिला दो फिर में आपकी बात सुनेगा। अब कमाली सर्वानंद को पानी पिला देती है। 

      पानी पीकर सर्वानंद कहता है अब बोलो आप क्या कहना चाहती हो। कमाली कहती है कि में तो आपको ये कहना चाहती थी कि ये हरिजनों की बस्ती है। ये कुआ भी हरिजनों का है। आप मुझे पण्डित लग रहे हो।कमाली की इतनी बात सुनकर सर्वानंद गुस्सा हो जाता है कि तुम मुझे पहले नही बता सकती थी। ये हरिजनों का कुआ है। तुमने मेऱा धर्म भरष्ट करवा दिया। हम पंडित  नीच जाती वालो के हाथ से कभी कुछ खाते पीते नही है। अब कमाली कहती है कि सर्वानंद जी मैने तो आपको पहले ही बताना चाहा था पर उस समय तो आपके प्यास से प्राण जाने वाले थे। इसलिए आपने मेरी बात सुनी ही नही। अब आप पंडित का रोब जाड़ रहे हो अगर ऐसे आपका धर्म भ्रष्ट होता है, तो आपको पहले पूछ कर पानी पीना चाहिए था। 

     अब सर्वानंद कहता है चल ठीक है मुझे कबीर जुलाहे के पास जाना है। तुम्हे पता है  कबीर कहा रहता है ? कमाली कहती है चलो मेरे साथ मे भी वही जा रही हु। अब कमली ओर सर्वानन्द कबीर जी की कुटिया में पहुचते है। कमाली पानी का मटका उतारकर सर्वानंद को कहती है कि पण्डित जी यही है कबीर जी की कुटिया ।

    अब सर्वानंद एक पानी से पूरा भरा हुआ लोटा देते है। कमाली से कहते है कि ये लोटा कबीर जी को दे देना। अब कमाली कबीर जी के पास पानी से भरा लोटा लेकर जाती है। कबीर परमात्मा एक कपड़े सिलने की सुई उस लोटे में डालते है। कमाली से कहते है कि जा वापिस इस लोटे को सर्वानंद को दे दे। 

   अब कमाली उसे वापिस सर्वानंद के पास लेकर जाती है। सर्वानंद कबीर जी से पूछता है कि में लौटे में आपकी सुई डालने का मतलब समझा नही।  कबीर परमात्मा कहते है कि आपने ये पानी से भरा लोटा मेरे पास क्यों भेज था सर्वानद कहता है कि में इसके माध्यम से आपको ये समझाना चाहता था कि जिस तरह इस पानी के भरे लोटे में एक बूंद भी पानी और नही समा सकता। ठीक उसी प्रकार में भी ज्ञान से भरा पड़ा हु। मुझमें भी ओर ज्ञान नही समा सकता। इसलिए बिना बहस किये आप ज्ञान चर्चा में हार मान लो। कबीर परमात्मा बोले जैसे मेरी डाली हुई सुई लोटे की तली में जा कर टिकी है और तेरा पानी लोटे से बाहर आ गया है। ऐसे ही मेरा ज्ञान तुम्हारे अंदर जाकर अपनी जगह बना लेगा।  तेरा ये  अज्ञान पानी की तरह बाहर निकल जायेगा। 

     लेकिन सर्वानंद नही मानता है और ज्ञान चर्चा शुरू होती है अब कबीर परमात्मा सर्वानंद से पूछते है कि

कौन ब्रह्मा की माँ है कौन विष्णु का बाप 
शंकर का दादा कौन है हम को बता दो आप  

     अब सर्वानंद के पास इसका जबाब तो था नही जोर जोर से धारावाहिक संस्कृत बोलने लग जाता है। अब उस समय ज्ञान चर्चा का फैसला अनपढ़ लोग करते थे । अनपढ़ लोगो ने देखा कि वह सर्वानंद कितनी धारावाहिक संस्कृत बोल रहा है  इसलिए सर्वानंद जीत गया।  

      अब कबीर परमात्मा ने सोचा  इस मूर्ख से क्या ज्ञान चर्चा करू। मै इससे ब्रह्मा विष्णु और शिव के माता पिता का नाम पूछ रहा हु।  ये मूर्ख कुछ और ही बके जा रहा है। इसलिए कबीर परमात्मा बोले भाई सर्वानन्द जी में हार गया और आप जीत गए।

     अब सर्वानन्द बोला कबीर जी ऐसे मेरी माँ नही मानेगी आप लिख कर दे दो। कबीर पमात्मा बोले भाई में तो अनपढ़ हु। आप लिख लो में अपना अंगूठा लगा दूंगा। जहा आप कहोगे अब सर्वानन्द लिखता है कि ज्ञान चर्चा में कबीर जी हार गए और सर्वानन्द जीत गया। कबीर जी का अंगूठा लगवा कर अपनी माँ शारदा के पास जाता है। 

       अब सर्वानन्द अपनी माँ से कहता है मै मैन कबीर जी को ज्ञान चर्चा में हरा दिया है। अब आप मेरा नाम सर्वजीत रख दो शारदा कहती है। ऐसे नही मैने कहा था तुम कबीर जी से लिखवा कर लाना सर्वानन्द कहता है। मै में लिखवा कर लाया हूं।

    अब शारदा कहती है कि पढ़ कर सुना अब सर्वानन्द जब पढ़ता है। तो उसमें लिखा था कि ज्ञान चर्चा में सर्वजीत हार गया और कबीर जी जीत गए। अब सर्वानन्द कहता है कि लगता है लिखने में गलत्ति हो गई। मै दुबारा लिखवा कर लाता हूं। 

     ये कहकर सर्वानन्द फिर कबीर जी के पास जाता है। कबीर जी कहते है कोई बात नही सर्वानन्द दुबारा लिख ले भाई में फिर अंगूठा लगा देता हूं। अब दुबारा लिख कर कबीर जी का अंगूठा लगवाकर  फिर सर्वानन्द अपनी माँ के पास आता है। पढता है तो फिर वही लिखा था कि ज्ञान चर्चा में सर्वानन्द हार गया और कबीर जी जीत गए।

      अब सर्वानन्द अपनी माता शारदा को कहता है कि लगता है मुझसे लिखने में फिर भूल हो गई। इसलिए इस बार कोई गलत्ति नही करूंगा। फिर कबीर परमात्मा के पास गया। कबीर परमात्मा फिर बोले कि सर्वानन्द कोई बात नही एक बार फिर लिख ले। मै अंगूठा लगा दूंगा। अबकी बार  सर्वानन्द उन्ही लाइन को पढ़ता पढता अपनी माता के पास जाता है। क्या देखता है कि उसकी आँखों के सामने ही शब्द बदल जाते है।

     अब शारदा सर्वानन्द से कहती है कि कबीर जी स्वयं पूर्ण ब्रह्म है। जाकर उनके पैर पकड़ कर माफी मांग लो। अपने इस आधे अधूरे ज्ञान को छोड़कर पूर्ण परमात्मा कबीर से पांचवे वेद सूक्षम वेद का ज्ञान समझो। उनसे नाम दीक्षा लेकर मर्यादा में रहकर मोक्ष प्राप्त करके अपने असली घर सतलोक चल। 

     तब सर्वानन्द जी कबीर परमात्मा के पैरो में गिरकर माफी मांगता है और उनसे नाम दीक्षा लेकर पूर्ण ब्रह्म कबीर साहेब की शरण ली।
       शास्त्रानुकूल साधना से ही मोक्ष की प्राप्ति की जा सकती है।आज पुरे विश्व में शाशत्रानुकुल साधना केवल संत रामपाल जी महाराज ही बताते है। आध्यात्मिक जानकारी के लिए आप संत रामपाल जी महाराज जी के मंगलमय प्रवचन सुनिए। 

     साधना चैनल पर प्रतिदिन शाम 7:30 से 8.30 बजे 
     श्रधा चैनल पर प्रतिदिन दोपहर 2:00से 3:00 बजे

                            सत साहिब जी

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