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लोक व परलोक के दो पाटों के बीच घूमते कालचक्र के दो पहियों सुख-दुख, रात-दिन, जीवन-मॄत्यु ,इत्यादि!

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चलती चक्की देख कर, दिया कबीरा रोये !  दो पाटन के बीच में, साबित बचा न कोय !!           एक बार सुबह सुबह एक बहना चक्की चला रही थी। कबीर साहिब जी ने चक्की चलती देखी। कबीर साहिब जी ने वही पर इस पद की रचना की।           कुछ समय बाद कबीर साहिब का मुहबोला लडका कमाल उस पद को गा रहा था। कबीर साहिब जी बैठे सुन रहे थे। कबीर साहिब जी ने कहा कि रुको, ठीक कहते हो कि दो पाट के बीच कोई भी साबित नहीं बचा। लेकिन बीच में एक कील है। उसके सहारे जो गेहूं के दाने लग जाते हैं, वे नहीं पिसते।  उनको फिर दुबारा डालना पड़ता है। जिसने कील का सहारा लिया वह बच गया।            काल भगवान इस संसार दो पाटों की तरह पीस रहा है। लेकिन इसमें मेरु की कील भी है। मेरू की कील एक सतगुरू की तरह है। सतगुरू हमे इस काल भगवान के दो पाट की चक्की मे पीसने से बचाते है। और इस काल जाल  से मुक्त कराकर अमरस्थान ले जाते है। जहा काल भगवान नही पहुच सकता।           हमे चक्की की मेरू की कील अर्थात् सतगुरू जी को ध्याना है का...