गरुड बोध सागर

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         तीनों देवताओं ने कहा, हे पक्षीराज! आपको कैसे विश्वास हो कि हम जगत के कर्ता हैं? आप जो चाहो, परीक्षा करो। गरूड़ जी उठकर उड़कर कबीर जी के पास आए तथा सब वृतांत बताया।

          तब कबीर साहिब ने कहा कि बंग देश में एक ब्राह्मण का बारह वर्षीय बालक है। उसकी आयु समाप्त होने वाली है। वह कुछ दिन का मेहमान है। कबीर साहिब ने उस बालक को शरण में लेने के लिए ब्रह्मा, विष्णु, शिव की स्थिति बताई जो गरूड़ तेरे को बताई है। उस बालक ने बहुत विवाद किया और मेरे ज्ञान को नहीं माना।

       तब कबीर साहिब ने उस बालक से कहा कि तेरी आयु तीन दिन शेष है। यदि तेरे ब्रह्मा-विष्णु-शिव समर्थ हैं तो अपनी रक्षा कराओ। मैं इतना कहकर अंतरध्यान हो गया। बालक बेचैन है। उस बालक को लेकर देवताओं के पास जाओ। उनसे  कुछ बनना नहीं है। फिर आप मेरे से ध्यान से बातें करना। मैं तेरे को आगे क्या करना है, वह बताऊँगा। 

     गरूड़ जी उस बालक को लेकर ब्रह्मा-विष्णु-शिव के पास गए। गरूड़ ने बालक को समझाया कि आप उन देवताओं से कहना कि हम आपके भक्त हैं। मेरे दादा-परदादा, पिता और मैंने सदा आपकी पूजा की है। मेरे जीवन के दो दिन शेष हैं। मेरी आयु भी क्या है? कृपा मेरी आयु वृद्धि कर दें। बच्चे ने यही विनय की तो तीनों ने कोशिश की परंतु व्यर्थ। फिर विचार किया कि धर्मराज के पास चलते हैं। सबका हिसाब उसी के पास है। उससे वृद्धि करा देते हैं। यह विचार करके सबके सब धर्मराज के पास गए।

       उनसे तीनों देवताओं ने कहा कि पहले तो यह बताओ कि इस ब्राह्मण बच्चे की कितनी आयु है? धर्मराज ने डाॅयरी देखकर बताया कि कल इसकी मृत्यु हो जाएगी। तीनों देवताओं ने कहा कि आप इस बच्चे की आयु वृद्धि कर दो। धर्मराज ने कहा, यह असंभव है। तीनों ने कहा कि हम आपके पास बार-बार नहीं आते, आज इज्जत-बेइज्जती का प्रश्न है। हमारे आये हुओं की इज्जत तो रख लो। धर्मराज ने कहा कि एक पल भी न बढ़ाई जा सकती है, न घटाई जा सकती है। यदि आप अपनी आयु इसको दे दो तो वृद्धि कर सकता हूँ।

        यह सुनते ही सबकी हवा निकल गई। उस समय कहने लगे कि यह तो परमेश्वर ही कर सकता है। वहाँ से तुरंत चल पड़े और गरूड़ से कहा कि कोई और समर्थ शक्ति है तो तुम इसकी आयु बढ़वाकर दिखा दो। गरूड़ ने कबीर जी से ध्यान द्वारा सम्पर्क किया। 

       परमेश्वर कबीर जी ने ध्यान द्वारा बताया कि आप इसके लिए मानसरोवर से जल ले आओ। वहाँ एक श्रवण नाम का भक्त मिलेगा। उसको मैंने सब समझा दिया है, आप अमृत ले आओ। गरूड़ जी ने जैसी आज्ञा हुई, वैसा ही किया। अमृत लाकर उस बच्चे को पिला दिया। उस बालक के पास मैं गया। गरूड़ ने उसे सब समझा दिया कि अमृत तो बहाना है। ये स्वयं परमेश्वर हैं। इन्होंने जल मन्त्रित करके दिया था। बालक तुम दीक्षा ले लो। इस अमृत से तो दस दिन जीवित रहोगे। बालक ने मेरे से दीक्षा ली। 

       जब बालक 15 दिन तक नहीं मरा तो गरूड़ ने तीनों ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव जी को बताया कि वह बालक जीवित है। मेरे गुरू जी से दीक्षा ले ली है। उन्होंने उस बच्चे को पूर्ण आयु जीने का आशीर्वाद दे दिया है। ब्रह्मा-विष्णु-महेश तीनों फिर धर्मराज के पास गए, साथ में गरूड़ भी गया। तीनों देवताओं ने धर्मराज से पूछा कि वह बालक कैसे जीवित है, उसको मर जाना चाहिए था। धर्मराज ने उसका खाता देखा तो उसकी आयु लम्बी लिखी थी।
        धर्मराज ने कहा कि यह ऊपर से ही होता है। यह तो कभी-कभी होता है। उस परमेश्वर की लीला को कौन जान सकता है? तीनों देवताओं को आश्चर्य हुआ, परंतु मान-बड़ाई के कारण प्रत्यक्ष देखकर भी सत्य को माना नहीं। अपना अहम भाव नहीं त्यागा। गरूड़ को विश्वास अटल हो गया।

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