अंत समय मे आत्मा !
जब मनुष्य कुछ सांसो का जीवन शेष रह जाता है तो मनुष्य को यमदुत दिखाई देने लग जाते है। मनुष्य का दम धुटने लग जाता है। यमदुत आत्मा को यातना देते है कि वो शरीर छोड कर बहार आ जाये। उसके शरीर मे भाले तक चुभाये जाते है तब कही आत्मा शरीर छोडकर बहार आती है। जब शरीर छोड़ती है तो मनुष्य को पहले ही पता चल जाता है। वो स्वयं भी हथियार डाल देता है अन्यथा उसने आत्मा को शरीर में बनाये रखने का भरसक प्रयत्न किया होता है और इस चक्कर में कष्ट को झेला होता है ।
यदि उस व्यक्ति ने पुर्ण संत को गुरू बनाया है और उस संत द्वारा दिया नाम उपदेश कर रहा होता है तो यमदुत उस आत्मा के पास नही आते। एसी स्थिति जब बनती है जब पहले से ही नाम सुमरण का अभ्यास उस आत्मा ने कर रखा होता है। उस स्थिति मे उसके गुरू के रुप मे उसका इष्ट आता है जिसकी वो भगति कर रहा होता है।
अब उसके सामने उसके सारे जीवन की यात्रा चल-चित्र की तरह चल रही होती है। उधर आत्मा शरीर से निकलने की तैयारी कर रही होती है इसलिये शरीर के पाँच प्राण एक 'धनंजय प्राण' को छोड़कर शरीर से बाहर निकलना आरम्भ कर देते हैं।
ये प्राण, आत्मा से पहले बाहर निकलकर आत्मा के लिये सूक्ष्म-शरीर का निर्माण करते हैं। जो कि शरीर छोड़ने के बाद आत्मा का वाहन होता है। धनंजय प्राण पर सवार होकर आत्मा शरीर से निकलकर इसी सूक्ष्म-शरीर में प्रवेश कर जाती है।
बहरहाल अभी आत्मा शरीर में ही होती है और दूसरे प्राण धीरे-धीरे शरीर से बाहर निकल रहे होते है कि व्यक्ति को पता चल जाता है। उसे बे-चैनी होने लगती है, घबराहट होने लगती है। सारा शरीर फटने लगता है, खून की गति धीमी होने लगती है । सांस उखड़ने लगती है। बाहर के द्वार बंद होने लगते हैं।
अर्थात अब चेतना लुप्त होने लगती है और मूर्च्छा आने लगती है। फिर मूर्च्छा आ जाती है और आत्मा एक झटके से किसी भी खुली हुई इंद्री से बाहर निकल जाती है। इसी समय चेहरा विकृत हो जाता है। यही आत्मा के शरीर छोड़ देने का मुख्य चिन्ह होता है।
इससे पहले घर के आसपास कुत्ते-बिल्ली के रोने की आवाजें आती हैं। इन पशुओं की आँखे अत्याधिक चमकीली होती है। जिससे ये रात के अँधेरे में तो क्या सूक्ष्म-शरीर धारी आत्माओं को भी देख लेते हैं। जब किसी व्यक्ति की आत्मा शरीर छोड़ने को तैयार होती है तो उसके अपने सगे-संबंधी जो मृतात्माओं के तौर पर होते है। उसे लेने आते है और व्यक्ति उन्हें यमदूत समझता है और कुत्ते-बिल्ली उन्हें साधारण जीवित मनुष्य ही समझते है और अन्जान होने की वजह से उन्हें देखकर रोते है और कभी-कभी भौंकते भी हैं।
शरीर से पाँच प्रकार के प्राण बाहर निकलकर उसी तरह सूक्ष्म-शरीर का निर्माण करते हैं। जैसे गर्भ में स्थूल-शरीर का निर्माण क्रम से होता है ।
सूक्ष्म-शरीर का निर्माण होते ही आत्मा अपने मूल वाहक धनंजय प्राण के द्वारा बड़े वेग से निकलकर सूक्ष्म-शरीर में प्रवेश कर जाती है । आत्मा शरीर के जिस अंग से निकलती है उसे खोलती, तोड़ती हुई निकलती है। जो लोग भयंकर पापी होते है उनकी आत्मा मूत्र याँ मल-मार्ग से निकलती है।
जो पापी भी है और पुण्यात्मा भी है उनकी आत्मा मुख से निकलती है। जो पापी कम और पुण्यात्मा अधिक है उनकी आत्मा नेत्रों से निकलती है और जो पूर्ण धर्मनिष्ठ हैं, पुण्यात्मा और योगी पुरुष है या पुर्ण संत से नाम उपदेश लेकर शास्त्रोनुसार भगति की होती है तो उनकी आत्मा ब्रह्मरंध्र से निकलती है ।
अब शरीर से बाहर सूक्ष्म-शरीर का निर्माण हुआ रहता है। लेकिन ये सभी का नहीं हुआ रहता। जो लोग अपने जीवन में ही मोह माया से मुक्त हो चुके योगी पुरुष है। उन्ही के लिये तुरंत सूक्ष्म-शरीर का निर्माण हो पाता है। अन्यथा जो लोग मोह माया से ग्रस्त है परंतु बुद्धिमान है ज्ञान-विज्ञान से अथवा पांडित्य से युक्त है। ऐसे लोगों के लिये दस दिनों में सूक्ष्म शरीर का निर्माण हो पाता है
एक और बात, आत्मा के शरीर छोड़ते समय व्यक्ति को पानी की बहुत प्यास लगती है । शरीर से प्राण निकलते समय कण्ठ सूखने लगता है । ह्रदय सूखता जाता है और इससे नाभि जलने लगती है ।
लेकिन कण्ठ अवरूद्ध होने से पानी पिया नहीं जाता और ऐसी ही स्तिथि में आत्मा शरीर छोड़ देती है । प्यास अधूरी रह जाती है ।
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