अजामेल के उद्धार की कथा

#MuktiBodh_Part23

हम पढ़ रहे हैं मुक्तिबोध पेज नंबर (46-47)

‘‘अजामेल के उद्धार की कथा’’

काशी शहर में एक अजामेल नामक ब्राह्मण शराब पीता था। वैश्या के पास जाता था।
वैश्या का नाम मैनका था, बहुत सुंदर थी। परिवार तथा समाज के समझाने पर भी अजामेल नहीं माना तो उन दोनों को नगर से निकाल दिया। वे उसी शहर से एक मील दूर वन में कुटिया बनाकर रहने लगे। दोनों ने विवाह कर लिया। अजामेल स्वयं शराब
तैयार करता था। जंगल से जानवर मारकर लाए और मौज-मस्ती करता था।

विशेष :- अजामेल पूर्व जन्म में विष्णु जी का परम भक्त था। ब्रह्मचर्य का पूर्ण पालन
करता था। साधक समाज में पूरी इज्जत थी। बचपन से ही घर त्यागकर साधुओं में रहता था। वैश्या भी पूर्व जन्म में विष्णु जी की परम भक्त थी। ब्रह्मचर्य का पूर्ण पालन करती थी।
पर पुरूष की ओर कभी दोष दृष्टि से नहीं देखती थी। इस लक्षण से साधक समाज में विशेष सम्मान था।
साधकों में ध्यान समाधि लगाने का विशेष प्रचलन है जो केवल काल प्रेरणा है। हठ
योग है जो गीता तथा वेदों में मना किया है। एक दिन श्याम सुंदर (अजामेल का पूर्व जन्म
का नाम) लेटकर समाधि लगाए हुए था। शरीर पर केवल एक कोपीन (लंगोट जो एक छः
इंच चौड़ा तथा दो फुट लंबा कपड़े का टुकड़ा होता है जो केवल गुप्तांग को ढ़कता है।
तागड़ी में लपेटा जाता है। तागड़ी=बैल्ट की तरह एक मोटा धागा बाँधा जाता है, उसे तागड़ी कहते हैं।) पहने हुए था। सर्दी का मौसम था। दिन के समय धूप थी। उस समय श्याम सुंदर वैष्णव ने समाधि लगाई थी। रात्रि तक समाधि नहीं खुली। उस समय एक तीर्थ पर मेला लगा था। राम बाई (मैनका का पूर्व जन्म का नाम) ने देखा, यह साधु इतनी सर्दी में निःवस्त्र सोया है, नींद में ठण्ड न लग जाए। यह मर न जाए। यह विचार करके उसके ऊपर लेट गई और अपने कम्बल से अपने ऊपर से उस साधु को भी ढ़क लिया। अन्य व्यक्तियों को लगा कि कोई अकेला सो रहा है। भोर भऐ (सूर्य उदय होते-होते) श्याम सुंदर की समाधि खुली। उसने उठने की कोशिश की, तब रामबाई उठ खड़ी हुई। उस समय एक कम्बल से स्त्री-पुरूष निकले देखकर अन्य साधक भी उस ओर ध्यान से देखने लगे। 
श्याम सुंदर ने साधक समाज में अपने मान-सम्मान पर ठेस जानकर अपने को पाक-साफ सिद्ध करने के लिए राम बाई से कहा कि हे रंडी (वैश्या)! तूने मेरा धर्म नष्ट किया है। मैं तो अचेत था, तूने उसका लाभ उठा लिया। तू वैश्या बनेगी। अन्य साधु भी निकट आकर उनकी बातें सुनने लगे।
रामबाई ने कहा कि हे भाई जी! श्राप देने से पहले सच्चाई तो जान लेते। आप
निःवस्त्र सर्दी में ठिठुर रहे थे। आप अचेत थे। आपके जीवन की रक्षा के लिए मैंने आपको
ताप (गर्मी) देने के लिए मैं आपके ऊपर लेटी थी। कम्बल बहुत पतला है, चद्दर से भी पतला है। इसलिए मुझे इस पर विश्वास नहीं हुआ। एक बहन ने भाई की रक्षा के लिए यह बदनामी मोल ली है। आपने इसके फल में मुझे बद्दुआ (श्राप) दी है। सुन ले! तू अगले जन्म में भडु़वा बनेगा। वैश्याओं के पास जाया करेगा। दोनों ने एक-दूसरे को श्राप देकर अपनी भक्ति का नाश कर लिया। जब श्याम सुंदर को सच्चाई पता चली और अपना अंग देखा, सुरक्षित था तो रामबाई से बहुत हमदर्दी हो गई। अपनी गलती की क्षमा याचना की। विशेष प्रेम करने लगा। अधिक मोह हो गया। रामबाई भी श्यामसुंदर से विशेष प्यार करने लगी। वह प्यार एक मित्रवत था, परंतु मोह भी एक जंजीर (बंधन) है। मृत्यु उपरांत दोनों का जन्म काशी नगर में हुआ। श्याम सुंदर का नाम अजामेल था। ब्राह्मण कुल में जन्म हुआ। रामबाई का जन्म भी ब्राह्मण कुल में हुआ। उसका नाम मैनका था। श्राप संस्कारवश
चरित्रहीन हो गई। वैश्या बन गई। शॉप संस्कारवश अजामेल शराब का आदी हो गया।
वैश्या मैनका के पास जाने लगा। दोनों को नगर से निकाल दिया गया। दोनों लगभग 40-45 वर्ष की आयु के हो गए थे। संतान कोई नहीं थी। परमेश्वर कबीर जी कहते हैं, गरीबदास जी ने बताया है :-
गोता मारूं स्वर्ग में, जा पैठूं पाताल। गरीबदास ढूंढ़त फिरूं, हीरे मानिक लाल।।
कबीर, भक्ति बीज विनशै नहीं, आय पड़ो सो झोल। जे कंचन बिष्टा पड़े, घटै न ताका मोल।।
भावार्थ :- कबीर परमेश्वर जी ने संत गरीबदास जी को बताया कि मैं अपनी अच्छी
आत्माओं को खोजता फिरता हूँ। स्वर्ग, पृथ्वी तथा पाताल लोक में कहीं भी मिले, मैं वहीं
पहुँच जाता हूँ। उनको पुनः भक्ति की प्रेरणा करता हूँ। मनुष्य जन्म के भूले उद्देश्य की याद दिलाकर भक्ति करने को कहता हूँ। वे अच्छी आत्माऐं पूर्व के किसी जन्म में मेरी शरण में आई होती हैं, परंतु पुनः जन्म में कोई संत न मिलने के कारण वे भक्ति न करके या तो धन संग्रह करने में व्यस्त हो जाती हैं या बुराईयों में फँसकर शराब, माँस खाने-पीने में जीवन नष्ट कर देती हैं या फिर अपराधी बनकर जनता के लिए दुःखदाई बनकर बेमौत मारी जाती हैं। उनको उस दलदल से निकालने के लिए मैं कोई न कोई कारण बनाता हूँ। वे आत्माऐं तत्वज्ञान के अभाव से बुराईयों रूपी कीचड़ में गिर तो जाती हैं, परंतु जैसे कंचन
(स्वर्ण यानि सोना) टट्टी में गिर जाए तो उसका मूल्य कम नहीं होता। टट्टी (बिष्टा) से
निकालकर साफ कर ले। उसी मोल बिकता है। इसी प्रकार जो जीव मानव शरीर में एक
बार मेरी (कबीर परमेश्वर जी की) शरण में किसी जन्म में आ जाता है। प्रथम, द्वितीय या
तीनों मंत्रों में से कोई भी प्राप्त कर लेता है। किसी कारण से नाम खंडित हो जाता है, मृत्यु
हो जाती है तो उसको मैं नहीं छोडूंगा। कलयुग में सब जीव पार होते हैं। यदि कलयुग में
भी कोई उपदेशी रह जाता है तो सतयुग, त्रोतायुग, द्वापरयुग में उन्हीं की भक्ति से मैं बिना
नाम लिए, बिना धर्म-कर्म किए आपत्ति आने पर अनोखी लीला करके रक्षा करता हूँ। उसको फिर भक्ति पर लगाता हूँ। उनमें परमात्मा में आस्था बनाए रखता हूँ।

इसके आगे हम पढ़ेंगे कलयुग में सतयुग किस तरह आएगा।

क्रमशः..........
••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••
आध्यात्मिक जानकारी के लिए आप संत रामपाल जी महाराज जी के मंगलमय प्रवचन सुनिए। साधना चैनल पर प्रतिदिन 7:30-8.30 बजे। संत रामपाल जी महाराज जी इस विश्व में एकमात्र पूर्ण संत हैं। आप सभी से विनम्र निवेदन है अविलंब संत रामपाल जी महाराज जी से नि:शुल्क नाम दीक्षा लें और अपना जीवन सफल बनाएं।
https://online.jagatgururampalji.org/naam-diksha-inquiry

Comments

Popular posts from this blog

*निरंजन धन तुम्हरो दरबार*

💐 *मंशूर अली की कथा* 💐

कामरूप देश की जादूगर रानी