लख चौरासी की धारा
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नौ लख जल के जिव बखानी, चौदह लाख पक्षी परवानी।
किरम किट सताईस लाख, तीस लाख पिंडज भाखा।
चतुर लख मानुष परमाना, मानुष देह परम पद जाना।
और योनी परिचय नहीं पावे, कर्म बंध भव भटका खावे।
अनुरागसागर पेज न:-74
जलज जन्तु योनि -9,00,000
पक्षिगण वर्ग योनि -14,00,000
कीटपतंग वर्ग योनि-27,00,000
पशुयोनि वर्ग योनि-30,00,000
मानव वर्ग योनि-4,00,000
एवं गणनानुक्रमे=84,00,000
पदम् पुराण के एक श्लोकानुसार
जलज नव लक्षाणी, स्थावर लक्ष विम्शति,
कृमयो रूद्र संख्यक:।
पक्षिणाम दश लक्षणं, त्रिन्शल लक्षानी पशव:, चतुर लक्षाणी मानव:।। -78:5 पद्मपुराण
अर्थात जलचर 9 लाख, स्थावर अर्थात पेड़-पौधे 20 लाख, सरीसृप, कृमि अर्थात कीड़े-मकौड़े 11 लाख, पक्षी/नभचर 10 लाख, स्थलीय/थलचर 30 लाख और शेष 4 लाख मानवीय नस्ल के। कुल 84 लाख।
आप इसे इस तरह समझें
* पानी के जीव-जंतु- 9 लाख
* पेड़-पौधे- 20 लाख
* कीड़े-मकौड़े- 11 लाख
* पक्षी- 10 लाख
* पशु- 30 लाख
* देवता-मनुष्य आदि- 4 लाख
कुल योनियां- 84 लाख।
मानव योनि को चौरासी लाख योनियों में सबसे उत्तम माना गया है। क्योंकि मनुष्य ही परम पद की प्राप्ति कर सकते है, बाकी नहीं
लख चौरासी की धारा क्यों बनी?
धर्मदास पूछते हैं
चौरासी योनिन की धारा। किह कारण यह किन्ह पसारा।
नर कारण यह सृष्टि बना। के कोई और जिव भुगताई।
धर्मदास जी साहिब से पूछ रहे है की मनुष्य के कारण यह सृष्टि बनाई गयी, फिर दूसरी योनियाँ क्यों बनी! यानी चौरासी लाख योनियाँ क्यों बनाई गयी?
कबीर साहेब जी ने कहा कि
धर्मनी नर देहि सुखदायी। नर देहि गुरु ज्ञान समायी।
नर तनु काज कीन्ह चौरासी। शब्द न गहे मूढ़ मति नाशी।
चौरासी की चाल न छोड़े। सतनाम सो नेह न माडे।
ले डारे चौरासी माह।| परचे ज्ञान जहां कछु नाही।
पुनि पुनि दौड़ काल मुख जाही। ताहू ते जिव चेतत नाही।
यह तन पाय गहे सतनामा। नाम प्रतापे लहे निजधामा।
(अनुराग सागर पेज नो:-82)
कबीर साहेब जी धर्मदास से कहते है कि यह मानव चोला बड़ा ही सुखदायी है, इसी में गुरु ज्ञान समा सकता है। वास्तव में इस मानव चोले के कारण ही चौरासी बनायीं गयी ताकि जिव मुर्ख रहे, सत्य शब्द को न पकड़ पाये।
क्योकि विभिन्न योनिया से आने के कारण जिव चेतन नहीं हो पाता है, यदि लगातार मानव चोला मिलता रहे तो जिव चेतन होकर भक्ति में लग जायेंगे और संसार का कार्य नहीं चलेगा। इसीलिये उसे चौरासी में डाला गया, जहां ज्ञान नहीं है, जहां आत्म-साक्षात्कार नहीं किया जा सकता। इसी कारण जिव बार बार काल के मुख में जाता है और चेतन नहीं हो पाता है।यदि मानव तन पाकर कोई सतनाम को पकड़ ले तो अमर लोक चला जाता है।
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