गुरू निष्ठा

       कबीरा,  ते नर अंध है, जो गुरुको कहते और।
                  हरी रूठे गुरु ठौर है, गुरु रुठे नहीं ठौर।।
     कबीरा,  आप ही थगाईये, और ठगीये ना कोय, 
                 आप ठगे सुख होत है, और ठगे दूख होय।।

     प्राचीन काल में गोदावरी नदी के किनारे वेद धर्म मुनि के आश्रम में उनके शिष्य वेद शास्त्रादि का अध्ययन करते थे। एक दिन गुरु ने अपने शिष्यों की गुरुभक्ति की परीक्षा लेने का विचार किया।

      सभी शिष्यों में गुरु के प्रति इतनी अटूट श्रद्धा होती है कि उस श्रद्धा को नापने के लिए गुरुओं को कभी कभी योगबल का भी उपयोग करना पड़ता है। वेद धर्म मुनि ने शिष्यों से कहा कि हे शिष्यो ! अब प्रारब्धवश मुझे कोढ़ निकलेगा। मैं अंधा हो जाऊगां इसलिए काशी में जाकर रहूँगा।

       आप सब मे कोई मेरे साथ काशी जाकर रहे और मेरी अंतिम समय मे कोई सेवा कर सके। शिष्यों मे सनाटा छा गया। मुनी जी ने कहा कि हे शिष्यों! पहले तो कहा करते थे कि गुरुदेव ! आपके चरणों में हमारा जीवन न्योछावर हो जाय। मेरे प्रभु !ʹअब सब चुप हो गये।

     उनमें संदीपक नाम का शिष्य खूब गुरु सेवा परायण, गुरुभक्त था। उसने कहा कि गुरुदेव ! यह दास आपकी सेवा में रहेगा। गुरुदेव वेदधर्म मुनी ने कहा कि इक्कीस वर्ष तक सेवा के लिए रहना होगा।

      संदीपक नामक शिष्य ने कहा कि इक्कीस वर्ष तो क्या मेरा पूरा जीवन ही अर्पित है। गुरुसेवा में ही इस जीवन की सार्थकता है। वेदधर्म मुनि एवं संदीपक काशी में मणिकर्णिका घाट से कुछ दूर रहने लगे। कुछ दिन बाद गुरु वेदधर्म मुनी के पूरे शरीर में कोढ़ निकला और अंधत्व भी आ गया। शरीर कुरूप और स्वभाव चिड़चिड़ा हो गया।

     शिष्य संदीपक के मन में लेशमात्र भी क्षोभ नहीं हुआ। वह दिन रात गुरु जी की सेवा में तत्पर रहने लगा।वह कोढ़ के घावों को धोता, साफ, करता, दवाई लगाता, गुरु को नहलाता, कपड़े धोता, आँगन बुहारता, भिक्षा माँगकर लाता और गुरुजी को भोजन कराता।

     गुरु वेदधर्म मुनी जी गाली देते, डाँटते, तमाचा मार देते, डंडे से मारपीट करते और विविध प्रकार से परीक्षा लेते। किंतु संदीपक की गुरुसेवा में तत्परता व गुरु के प्रति भक्तिभाव अधिकाधिक गहरा और प्रगाढ़ होता गया।

      काशी मे एक दिन शिष्य संदीपक के समक्ष परमात्मा स्वम उसके इष्ट रूप मे प्रगट हो गये और बोले कि तेरी गुरुभक्ति एवं गुरुसेवा देखकर हम प्रसन्न हैं। जो गुरु की सेवा करता है वह मानो मेरी ही सेवा करता है। जो गुरु को संतुष्ट करता है वह मुझे ही संतुष्ट करता है।

     बेटा संदीपक ! कुछ वरदान माँग ले। इष्ट रूप मे प्रगट परमात्मा ने कहा।  शिष्य संदीपक गुरु से आज्ञा लेने गया और बोला कि हे गुरूदेव! इष्ट देव वरदान देना चाहते हैं आप आज्ञा दें तो वरदान माँग लूँ कि आपका रोग एवं अंधेपन का प्रारब्ध समाप्त हो जाय।

     गुरु जी ने डांटा कि वरदान इसलिए मांगता है कि मैं अच्छा हो जाऊ और सेवा से तेरी जान छूटे ! अरे मूर्ख ! मेरा कर्म कभी-न-कभी तो मुझे भोगना ही पड़ेगा।

      संदीपक ने इष्ट देव को वरदान के लिए मना कर दिया। इष्ट देव आश्चर्यचकित हो गये कि कैसा निष्ठावान शिष्य है ! इष्ट देव ने उसे द्वारा वरदान मागने के लिये कहा। संदीपक ने कहा कि प्रभु ! मुझे कुछ नहीं चाहिए।

     भगवान ने आग्रह किया तो बोला कि आप मुझे यही वरदान दें कि गुरु में मेरी अटल श्रद्धा बनी रहे। गुरुदेव की सेवा में निरंतर प्रीति रहे, गुरुचरणों में दिन प्रतिदिन भक्ति दृढ़ होती रहे।

    इष्ट देव भगवान ने संदीपक को गले लगा लिया।संदीपक ने जाकर देखा तो वेदधर्म मुनि स्वस्थ बैठे थे। न कोढ़, न कोई अँधापन !  सदगुरु ने संदीपक को अपनी तात्त्विक दृष्टि एवं उपदेश से पूर्णत्व में प्रतिष्ठित कर दिया।

       वेदधर्म मुनि जी बोले कि वत्स ! धन्य है तेरी निष्ठा और सेवा। पुत्र ! तुम धन्य हो ! तुम सच्चिदानंद स्वरूप हो। गुरु के संतोष से संदीपक गुरु-तत्त्व में जग गया, गुरुस्वरूप हो गया। अपनी श्रद्धा को कभी भी, कैसी भी परिस्थिति में सदगुरु पर से तनिक भी कम नहीं करना चाहिए।

     वे परीक्षा लेने के लिए कैसी भी लीला कर सकते हैं। गुरु आत्मा में अचल होते हैं, स्वरूप में अचल होते हैं। जो हमको संसार-सागर से तारकर परमात्मा में मिला दें, जिनका एक हाथ परमात्मा में हो और दूसरा हाथ जीव की परिस्थितियों में हो। गुरू स्वम् गोविन्द होते है। गुरू को अपना शिष्य एक मा का पुत्र के प्रति स्नेह से दुगना होता है।

          सदगुरु मेरा सूरमा, करे शब्द की चोट।
          मारे गोला प्रेम का, हरे भरम की कोट।।
          गुरु गोविन्द दोऊ खड़े, काके लागूँ पाये।
          बलिहारी गुरु आपने, गोविन्द दियो बताय।
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