MuktiBodh_Part - 33



        हम पढ़ रहे हैं मुक्तिबोध पृष्ठ नंबर (63-64)

शिवजी ने पार्वती जी को मंत्रों की जानकारी दी और कमलों के बारे में बताया तब तक पार्वती जी हां हूं हां कर रही थी। उसके बाद पार्वती जी को नींद आ गई।
बाद में वह गंदा (खराब) अण्डा स्वस्थ होकर उसमें तोते का बच्चा बन गया
और हाँ-हाँ करने लगा। आवाज में अंतर जानकर शिव जी ने पार्वती की ओर देखा तो वह
तो समाधि में थी। अंतर दृष्टि से देखा तो एक तोता सर्व ज्ञान सुन चुका था। शिव जी उस
तोते को मारने के लिए उठे तो वह तोता उड़ चला। शिव जी भी आकाश मार्ग से उसका
पीछा करने लगे। वेदव्यास ऋषि जी की पत्नी ने जम्भाई ली तो उसके मुख के द्वारा तोते
वाला जीव उस ऋषि की पत्नी के शरीर में गर्भ में चला गया। तोते वाला शरीर वहीं त्याग
दिया। शिव जी सब देख रहे थे। शिव जी ने वेदव्यास जी की पत्नी से कहा कि आपके गर्भ
में मेरे ज्ञान व भक्ति मंत्र का चोर है। उसने अमर कथा सुन ली है। वह भी अमर हो गया
है। (जितना अमरत्व उस मंत्र से होता है) व्यास जी भी वहीं आ गए तथा शिव जी को प्रणाम किया। आने का कारण जाना तो कहा कि हे भोलेनाथ! आप कह रहे हो कि वह अमर हो गया है। यदि वह जीव अमर हो गया है तो आप मार नहीं सकते। अब गर्भ में तो आप उसको बिल्कुल भी नहीं मार पाओगे। यह सुनकर शिव जी चले गए। पार्वती जी को समाधि से जगाया और अपने निवास पर चले गए। जिस स्थान पर शिव जी ने पार्वती जी को अमर मंत्र दिया था, उस स्थान को ‘‘अमरनाथ’’ के नाम से जाना जाता है। 12 (बारह) वर्ष तक व्यास जी की पत्नी को बच्चा उत्पन्न नहीं हुआ। तीनों देवता (श्री ब्रह्मा जी, श्री विष्णु जी तथा श्री शिव जी) व्यास ऋषि की कुटी पर आए और गर्भ में बैठे जीव से कहा कि आप जन्म लो, बाहर आओ। गर्भ में जीव को अपने पूर्व के जन्मों का ज्ञान होता है। जीव ने कहा,
स्वामियो! बाहर आते ही आपकी माया (गुणों का प्रभाव) जीव को भूल पैदा कर देती है। जीव अपना उद्देश्य भूल जाता है। आप अपनी माया को कुछ देर रोको तो मैं बाहर आऊँ। व्यास जी की पत्नी ने कहा कि मेरे गर्भ में लड़का है। मुझे किसी प्रकार का कष्ट नहीं है। इस लड़के ने सुख दिया है। इसका नाम मैं सुखदेव रखूँगी। तीनों देवताओं ने उसको शुकदेव नाम दिया क्योंकि वह शुक (तोते) के शरीर में भक्ति-शक्ति युक्त हुआ था। तीनों देवों ने कहा कि हे शुकदेव! हम अपनी गुण शक्ति को केवल इतनी देर तक रोक सकते हैं, जितनी देर गाय या भैंसे के सींग पर राई का दाना टिक सकता है यानि रखते ही गिर जाता है। शुकदेव ने कहा कि ऐसा ही करो। तीनों देवों ने अपनी गुण शक्ति को एक क्षण के लिए रोका। शुकदेव गर्भ से बाहर आया। तीनों देव चले गए। उस समय में 93 (तिरानवें) अन्य बच्चों का जन्म हुआ। उन सबको तथा शुकदेव को अपने उद्देश्य का ज्ञान रहा। वे सब महान भक्त-संत, सिद्ध बने। उनमें से 9 (नौ) तो नाथ प्रसिद्ध हुए तथा 84 (चौरासी) सिद्ध बने और एक शुकदेव ऋषि बना। सुखदेव के गर्भ से बाहर आते ही बारह वर्ष का शरीर बन गया। वह उठकर अपनी ओरनाल को (जो नली माता की नाभि से बच्चे की नाभि से जुड़ी होती है। उसके माध्यम से माता के शरीर से बच्चे की परवरिश होती है। उसकी लंबाई लगभग 1) फुट तक होती है।) अपने कंधे पर डालकर चल पड़ा। यह विचार किया कि कहीं दूर जाकर काट फेंकूंगा। कारण यह था कि सुखदेव जी नहीं चाहते थे कि मेरा परिवार में मोह बढ़े और मैं भक्ति नहीं कर पाऊँगा। दूसरी ओर व्यास ऋषि ने कहा कि बेटा हमने तेरे उत्पन्न होने क बारह वर्ष प्रतिक्षा की है। आप जाने की तैयारी कर रहे हो। हमने बेटे का क्या सुख देखा? आप घर त्यागकर ना जाओ। सुखदेव ने कहा, ऋषि जी! आप वेद-शास्त्रों के ज्ञाता विद्वान होकर भी मोह के दलदल में फँसे हो। मुझे भी फँसाने का प्रयत्न कर रहे हो। मेरे को अपने पूर्व जन्मों का ज्ञान है। अनेकों बार आप मेरे पिता बने। अनेकों बार मैं आपका पिता बना। अनेकों बाहर हमने चौरासी लाख प्राणियों के शरीरों में कष्ट उठाए। अबकी बार मुझे मेरे लक्ष्य का ज्ञान है। मैं भक्ति करके अपना जन्म सफल करूँगा। यह वार्ता सुखदेव जी ने अपने माता-पिता की ओर पीठ करके की और आकाश में उड़ गए। पूर्व जन्म की भक्ति से प्राप्त सिद्धि-शक्ति बची थी, उससे उड़ गया। उसी के अभिमान से कोई गुरू नहीं किया।
फिर श्री विष्णु जी ने अपने लोक वाले स्वर्ग से निकाल दिया और कहा कि यदि यहाँ स्थान
चाहते हो तो राजा जनक मिथिलेश से दीक्षा लो और भक्ति करके आओ। सुखदेव जी ने
वैसा ही किया।

सुमरण के अंग की वाणी नं. 71 से 76 :-
गरीब, ऐसा राम अगाध है, अविनासी गहिर गंभीर। हदि जीवों सें दूर हैं, बे हदियों के तीर।।71।।
गरीब, ऐसा राम अगाध है, बे कीमत करतार। सेस सहसंफुनि रटत है, अजहुं न पाया पार।।72।।
गरीब, ऐसा राम अगाध है, अपरंपार अथाह। उरमें किरतम ख्याल है, मौले अलख अल्लाह।।73।।
गरीब, ऐसा राम अगाध है, निरभय निहचल थीर। अनहद नाद अखंड धुनि, नाड़ी बिना सरीर।।74।।
गरीब, ऐसा राम अगाध है, बाजीगर भगवंत। निरसंध निरमल देखिया, वार पार नहिं अंत।।75।।
गरीब, पारब्रह्म बिन परख है, कीमत मोल न तोल। बिना उजन अनुराग है, बहुरंगी अनमोल।।76।।

सरलार्थ :- 

जो पूर्ण परमात्मा है। वह ऐसा अगाध राम है यानि सबसे आगे वाला
(अगाध) सर्वोपरी है। अविनाशी तथा गहर गम्भीर (समुद्र की तरह शक्ति से भरा गहरा) है।
वह हद जीवों (जो काल की सीमा वाले हैं। उसी काल ब्रह्म पर आश्रित हैं, उन जीवों) से
दूर है। उनको उसका ज्ञान नहीं है। इसलिए उनको उस अविनाशी परमेश्वर से कोई लाभ
प्राप्त नहीं होता। जो बेहद के हैं यानि जिन्होंने उस असीम शक्तियुक्त परमात्मा को जान
लिया है, वह परमात्मा उनके साथ है।(71)

 वह परमात्मा पारस पत्थर की तरह अनमोल (बेकीमत) है। उस परमात्मा की प्राप्ति
के लिए शास्त्रविधि रहित नाम यानि राम का जाप शेष नाग जी हजार (संहस्र) मुखों से जप
रहा है। आज तक उनको भी अविनाशी परमात्मा का पार (अंत) नहीं पाया है।(72)

परमेश्वर अपरमपार अथाह यानि समन्दर की तरह अमित शक्ति संपन्न है। तत्वज्ञान
के अभाव से प्रत्येक ऋषि-देव अपने उर (हृदय) में किरतम यानि कृत्रिम (मन कल्पित)
ख्याल (विचार) से मौला (परमात्मा) अलख अल्लाह (निराकार-दिखाई न देने वाला) मानते
हैं।(73)

वह परमेश्वर अचल (निश्चल) यानि अविनाशी है, निर्भय है। थीर का अर्थ भी स्थिर
यानि निश्चल होता है। पद्य भाग में पदों की तथा रागों को पूर्ण करने के कारण ऐसे दोहरे
शब्दों का प्रयोग किया जाता है। उस परमेश्वर के लोक में अखण्ड धुन बज रही है। उस
परमेश्वर का शरीर पाँच तत्व से बने नाड़ी वाला नहीं है।(74)  वह परमेश्वर बाजीगर की तरह अद्भुत चमत्कार करता है। निरसंध (जिसकी शक्ति
की सीमा नहीं) तथा पवित्र है। वह अपरमपार शक्ति वाला है। जिस सतपुरूष को अन्य
गुरूजन व ऋषिगण अलख अल्लाह (निराकार प्रभु) कहते हैं। उनको परमात्मा प्राप्ति नहीं
हुई है। यह मैंने (संत गरीबदास जी ने) देखा है।(75)

पारब्रह्म परमात्मा की परख (पहचान) किसी को नहीं है। उसकी कीमत (मूल्य) तथा
तोल (वजन) का क्या वर्णन किया जा सकता है? उसकी महिमा सुनकर उसके प्रति अनुराग (प्रातिका प्रेम) मेरे को है। वह बहुरंगी है। जैसे काशी में जुलाहा (धाणक) बना। मेरे को (संत गरीबदास जी को) जिन्दा बाबा के रूप में सतलोक में सतपुरूष रूप में बैठा देखा, इस प्रकार बहुरूपिया मिला।(76)

क्रमशः..........
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