अलल पंख पक्षी और चन्डूल पक्षी

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    अलल पक्षी और चन्डूल पक्षी दो ऐसे दुर्लभ पक्षी है जो संभवत संसार में कुछ ही लोग देख पाते होंगे इनमें चन्डूल पक्षी तो खैर काफ़ी लोंगो ने देखा होगा फ़िर भी इसे देखने वालों की संख्या अधिक नहीं होती।

      चन्डूल पक्षी की खासियत ये होती है कि ये किसी भी आवाज की नकल कर लेता है चाहे वह पुरुष महिला या किसी जानवर या अन्य पक्षी या अन्य कोई भी जो आवाज है जैसी आवाज है उसकी वखूबी नकल कर लेता है। इसकी इस मक्कारी की वजह से कई बार लोग जंगलों में मुसीवत में पङ गये क्योंकि इसने उन्ही में से किसी की आवाज की नकल कर अथवा कोई अन्य इतर आवाज वनाकर लोगों को भ्रमित किया इसी लिये चान्डाल स्वभाव का मानने के कारण इसका नाम चन्डूल रखा गया। 

       एक अनल पक्षी (अलल पंख) आकाश में रहता था। यह पक्षी अब लुप्त हो चुका है। इसके चार पैर होते थे। आगे वाले छोटे और पीछे वाले बड़े। इसका आकार बहुत बड़ा होता था। लम्बे-लम्बे पंख होते थे। पूरा पक्षी यानि युवा पक्षी चार हाथियों को एक साथ उठाकर आकाश में अपने परिवार के पास ले जाता था।

    अलल पक्षी ऊपर वायु में रहता था। वहीं से मादा अनल अण्डे उत्पन्न कर देती थी। वह अण्डे उस स्थान पर छोड़ती थी जहाँ केले का वन होता था। केले एक-दूसरे में फँसकर गहरा वन बना लेते थे। हाथियों का झुण्ड यानि सैंकड़ों हाथी भी केले के वन में रहते थे क्योंकि हाथी केले के पेड़ खा जाता है तथा केले के पेड़ों पर ही लेट जाता है। मस्ती करता रहता है।

    अलल पक्षी का अण्डा वायुमंडल से गुजरकर नीचे पृथ्वी तक आने में हवा के घर्षण से पककर बच्चा तैयार हो जाता था। वह अण्डा केले के पेड़ों के ऊपर गिरता था। केले के पेड़ों की सघनता के कारण वह अण्डा क्षतिग्रस्त नहीं होता था। केवल इतनी गति से केले के पेड़ों को तोड़कर पृथ्वी पर गिरता था कि अण्डा फूट जाए। अण्डे का आकार बहुत बड़ा होता था। उसका कवर भी सख्त मजबूत होता था।

     बच्चे के बचाव के लिए अण्डे के कवर तथा बच्चे के बीच में गद्देदार पदार्थ होता था जो पृथ्वी के ऊपर गिरते समय बच्चे को चोट लगने से बचाता था। अनल पक्षी का बच्चा पृथ्वी पर अन्य पक्षियों के बच्चों के साथ रहता था। उनसे मिलकर उड़ता था, परंतु उसकी अंतर आत्मा यह मानती थी कि यह मेरा घर-परिवार नहीं है, मेरा परिवार तो ऊपर है। मैंने ऊपर अपने परिवार में जाना है। यह मेरा संसार नहीं है।

    वह जब युवा हो जाता है तो हाथियों के झुण्ड पर झपट्टा मारता था। चार हाथियों को चारों पंजों से उठाता था तथा एक हाथी को चौंच से पकड़कर उड़ जाता था। अपने परिवार के पास चला जाता था। साथ में उनके लिए आहार भी ले जाता था। 

    कबीर परमेश्वर जी ने सटीक उदाहरण बताकर भक्त को मार्गदर्शन किया है कि आप इस संसार के स्थाई वासी नहीं हैं। आपको यह छोड़कर जाना है। आपका परिवार ऊपर सत्यलोक में है। आप इस पृथ्वी के ऊपर गिरे हो। तत्त्वज्ञान प्राप्त भक्त के मन की दशा उस अलल पक्षी के बच्चे जैसी होनी चाहिए।

     गरीब, पतिब्रता के संग है, पारब्रह्म जगदीस। 
            नरआकार निज निरमला, है सो बिसवे बीस।।
    गरीब, सकल समाना एक में, एक समाना एक। 
           निहचै होइ तौ पाईये, कहा धरत है भेख।।
     गरीब, पारब्रह्म की परख के, नैंन निरंतरि नाल। 
           उर अंतर प्रकासिया, देख्या अबिगत ख्याल।।
     गरीब, पारब्रह्म की जाति में, मिलती है सब जात। 
            सुंन सरोवर बिमल जल, अरस अनूपम रात।।
     गरीब, आदि अनाहद अगम है, पतिब्रता के पास। 
              सहस इकीसौं अष्टदल, थीर करों दम स्वास।।
     गरीब, कित पंछी का खोज है, कहां मीन का पैर। 
              दिल दरिया में पैठि कर, देखो अबिगत लहर।।
     गरीब, अलल पंख के लोक कूं, जानत है नहिं कोइ। 
              अललपंख का चीकला, घर पावैगा सोइ।।
     गरीब, सिकल बिकल संसार है, पतिब्रता दिल थीर। 
             अचल अनाहद अरस धुनि, डोलै नहीं सरीर।।
     गरीब, लोहा कंचन हो गया, मिलि पारस सतसंग। 
             यौह मन पलटत है नहीं, साधौ के प्रसंग।।
     गरीब,जुगन जुगन का कुटल है,जुगन जुगन का जिंद। 
             पतिब्रता सो जानिये, रहै मनोरथ बंध।।
     गरीब, बारह बानी ब्रह्म है, सहस कला कल धूत। 
             पतिब्रता सो जानिये, राखै मन संजूत।।
    गरीब, ज्यूं मंहदी के पान में, लाली रही समाय। 
             यों साहब तन बीच है, खोज करो सत भाय।

       सरलार्थ पूर्व में किया गया है, वैसा ही है। भावार्थ है कि जो भक्त पूर्ण परमात्मा को सच्चे भाव से याद करता है यानि भक्ति करता है तो जगदीश उसके साथ रहता है। उसकी सहायता करता है। वास्तव में परमात्मा नराकार यानि मानव स्वरूप है। बिसवे बीस का अर्थ है पूर्ण रूप से। बीस बिसवे का एक पक्का बीघा होता है। वह पूर्ण माना जाता है। यहाँ पर उसी उपमा से परमात्मा को समर्थ कहा है।

      यदि मेरी बातों पर विश्वास है तो परमात्मा मिलेगा। यदि नहीं है तो साधु वेश बनाने का कोई लाभ नहीं है। पाक साफ है। सुन्न सरोवर यानि आकाश में सतलोक रूपी सरोवर है। उसमें सुख रूपी जल है। उस अनुपम यानि अद्भुत अरस यानि आसमान में बने सतलोक में रात-दिन लगन लगा।
    
     एक पारब्रह्म यानि पूर्ण परमात्मा की जाति यानि लक्षण सब देवों से मिलते हैं, परंतु पूर्ण परमात्मा समर्थ हैं। जैसे नमक और बूरा के लक्षण मिलते-जुलते होते हैं, परंतु खाने पर।पता चलता है। परमात्मा दृढ़ भक्त के साथ है।

       संहस इक्कीसों यानि दिन-रात में मानव सामान्य विधि से इक्कीस हजार छः सौ श्वांस-उश्वांस दम-श्वांस लेता है। उन सबको परमात्मा के स्मरण में लगाऐं। थीर करो का अर्थ है श्ंवास-उश्वांस से नाम पर दृढ़ता से मन लगाओ।

जैसे पक्षी उड़कर चलता है तो उसकी खोज किसी चिन्ह से नहीं हो सकती अर्थात् पक्षी अपने पीछे कोई निशान नहीं छोड़ता। जैसे मछली जल में कोई निशान बनाती हुई नहीं तैरती, इसी प्रकार प्रत्येक साधक भक्ति की शक्ति से उड़कर या जल की तरह चलकर सतलोक चला जाता है।

     अन्य व्यक्ति उसके मार्ग की खोज करके नहीं जा सकता। उसे भी भक्ति करके शक्ति रूपी पंख लगवाने पड़ेंगे। मन रूपी मछली को दिल रूपी दरिया में यानि हृदय से लगन लगा। भक्ति करके उस अविगत (अव्यक्त) परमात्मा की लहर यानि अनन्त सुख को देखो।

     अलल पंख की जानकारी गुरूदेव के अंग के सरलार्थ में वाणी नं. 1 के सरलार्थ में विस्तार से बताई है। चीकला माने पक्षी का नवजात बच्चा जिसको पंख नहीं लगी हों। भावार्थ है कि जो भक्त अंश है, वह भक्ति उस भाव से करता है जैसे अलल पक्षी का बच्चा अपना ध्यान आसपास मन में लगाए रहता है।

     उसकी आत्मा में यह समाया होता है कि तेरा परिवार ऊपर है। जब तक वह उड़ने योग्य नहीं होता तो अन्य पक्षियों के साथ रल-मिलकर रहता है, परंतु युवा होते ही उड़कर ऊपर अपने माता-पिता के पास चला जाता है। इसी प्रकार तत्वज्ञान प्राप्त भक्त को शत प्रतिशत विश्वास होता है कि अपना ठिकाना सतलोक में है। 
    वही चीकला यानि भक्ति प्रारम्भ करने वाला भक्त भक्ति पूरी करके निर्बाध सतलोक वाले घर को प्राप्त करेगा।  संसार सिकल-बिकल यानि चंचल है, कभी भक्ति करने लगता है, कभी छोड़ देता है, परंतु पूर्ण विश्वासी भक्त थीर यानि भक्ति पर दृढ़ रहता है। वह आकाश में परमात्मा मे निरंतर धुनि-लगन, थीर टिकाकर लगाता है।

.      शास्त्रानुकूल साधना से ही मोक्ष की प्राप्ति की जा सकती है।आज पुरे विश्व में शाशत्रानुकुल साधना केवल संत रामपाल जी महाराज ही बताते है।आप सभी से विनम्र निवेदन है अविलंब संत रामपाल जी महाराज जी से नि:शुल्क नाम दीक्षा लें। अपना जीवन सफल बनाएं। आध्यात्मिक जानकारी के लिए आप संत रामपाल जी महाराज जी के मंगलमय प्रवचन सुनिए। 

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