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Showing posts from November, 2020

सृष्टि रचना

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सर्व धर्मों के अनुसार सृष्टि की रचना का विवरण सृष्टि रचना आज तक एक ऐसी रहस्यमयी पहेली बनी हुई थी जिसे समझ पाना किसी के लिए भी संभव नहीं था। कुछ प्रश्न जैसे - ग्रह और उपग्रह अपनी कक्षा में लगातार कैसे घूमते हैं? यदि सूर्य आग का गोला है, तो चाँद इतना शीतल कैसे है? जल, वायु, पृथ्वी, अग्नि, आकाश जैसे तत्वों कि रचना किस ने की है? क्या ये ब्रह्माण्ड, ये गृह, उपग्रह, मनुष्य और अन्य जीव स्वयं ही अस्तित्व में आये? अगर नहीं तो फिर वो परमशक्ति कौन है जिसने ये सब संरचना की? क्या उसे देखा जा सकता है? पाया जा सकता है? ये प्रश्नों का उत्तर पाने के लिए मनुष्य हमेशा से ही प्रयासरत रहा है परन्तु बहुत दुःख की बात है की सभी धर्मों के ग्रंथों में प्रमाण होने के बाद भी ये अद्वितीय तत्वज्ञान आज तक भक्त समाज से छिपा हुआ था। पर अब तत्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज द्वारा दिए गए आध्यात्मिक ज्ञान से हम सृष्टि रचना के रहस्य को समझ पाए हैं। तो आइये जानते हैं की ब्रह्माण्ड और इस सृष्टि की रचना कैसे हुई? हिन्दू धर्म के अनुसार सृष्टि की रचना इस्लाम के अनुसार सृष्टि की रचना ईसाई धर्म के अनुसार सृष्टि की रचना सिख धर्म के ...

नानक_जी_के_गुरु_कबीर_साहेब_जी_थे

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#नानक_जी_के_गुरु_कबीर_साहेब_जी_थे जब नानक जी बनारस गए और परमेश्वर कबीर साहेब से मिले तो देखकर सोचा यह तो वही मोहिनी सूरत है जिनके सतलोक में दर्शन हुए थे। नानक जी की खुशी का ठिकाना न रहा एवं प्रसन्नता से उनकी आंखों में अश्रु भर गए। कबीर साहेब के चरणों मे गिरकर नानक जी ने सत्यनाम प्राप्त किया और अपना कल्याण करवाया। गुरु नानक देव जी पूर्ण परमेश्वर की साधना करते थे। श्री नानकदेव जी को जो पहले एक ओंकार (ॐ) मन्त्र का जाप करते थे तथा उसी को सत मान कर कहा करते थे एक ओंकार। उन्हें बेई नदी पर कबीर साहेब ने दर्शन दे कर सतलोक (सच्चखण्ड) दिखाया तथा अपने सतपुरुष रूप को दिखाया। जब सतनाम का जाप दिया तब श्री नानक साहेब जी की काल लोक से मुक्ति हुई। इसी का प्रमाण पंजाबी गुरु ग्रन्थ साहिब के राग ‘‘सिरी‘‘ महला 1 पृष्ठ नं. 24 पर एक सुआन दुई सुआनी नाल, भलके भौंकही सदा बिआल। कुड़ छुरा मुठा मुरदार, धाणक रूप रहा करतार।।1।। मै पति की पंदि न करनी की कार। उह बिगड़ै रूप रहा बिकराल।। तेरा एक नाम तारे संसार, मैं ऐहा आस एहो आधार। मुख निंदा आखा दिन रात, पर घर जोही नीच मनाति।। काम क्रोध तन वसह चंडाल, धाणक रूप रहा करतार।...

गुरु_का महत्व

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#नित्यनियम_का_सरलार्थ_गुरुदेव_का_अंगवाणी  ●●●#गुरु_का_चुनाव_कैसे_करें●●●●●●●●  यथार्थ भक्ति बोध पुस्तक से :- गरीब, प्रपट्टन की पीठ में, सतगुरु ले गया साथ।  जहां हीरे मानिक बिकै, पारस लाग्या हाथ।।68  ➡️ सरलार्थ :- परलोक में जाने के लिए जिस पीठ (बाजार) पर मुझे सतगुरु साथ लेकर गए, वहीं पर हीरे-मोती भी बिक रहे थे। यहाँ पर हीरे-मोती का भावार्थ हैं कि स्वर्ग में देव पद यह तो मोती जाने तथा ब्रह्मलोक में देव पद हीरे जानें। भावार्थ है कि हम अपनी भक्ति कमाई (धन) से देव-पद भी प्राप्त कर सकते थे। अन्य भक्त ऐसा कर रहे थे, परंतु मेरे हाथ तो पारस लग गया। पारस का तात्पर्य सार शब्द (सार नाम) जिससे स्वयं तो महिमावान हुआ हो, अन्य भक्तों को भी पारस रुपी सारनाम व सत्यनाम देकर भक्ति धन के धनी बनाए। पारस एक पत्थर जैसा होता है, यदि पारस पत्थर से लोहे का गॉर्टर एक सिरे से स्पर्श हो जाए तो पूरा गॉर्टर (चाहे 15 फुट लम्बा हो) सोना (स्वर्ण) बन जाता है। मुझे पारस पत्थर जैसा मोक्ष मन्त्र मिला जिससे सत्यलोक परम पद मिला, फिर कभी जन्म-मरण नहीं होगा। चार मुक्ति जहाँ चम्पी करती, माया हो रही...