नानक_जी_के_गुरु_कबीर_साहेब_जी_थे

#नानक_जी_के_गुरु_कबीर_साहेब_जी_थे
जब नानक जी बनारस गए और परमेश्वर कबीर साहेब से मिले तो देखकर सोचा यह तो वही मोहिनी सूरत है जिनके सतलोक में दर्शन हुए थे। नानक जी की खुशी का ठिकाना न रहा एवं प्रसन्नता से उनकी आंखों में अश्रु भर गए। कबीर साहेब के चरणों मे गिरकर नानक जी ने सत्यनाम प्राप्त किया और अपना कल्याण करवाया। गुरु नानक देव जी पूर्ण परमेश्वर की साधना करते थे। श्री नानकदेव जी को जो पहले एक ओंकार (ॐ) मन्त्र का जाप करते थे तथा उसी को सत मान कर कहा करते थे एक ओंकार। उन्हें बेई नदी पर कबीर साहेब ने दर्शन दे कर सतलोक (सच्चखण्ड) दिखाया तथा अपने सतपुरुष रूप को दिखाया। जब सतनाम का जाप दिया तब श्री नानक साहेब जी की काल लोक से मुक्ति हुई।

इसी का प्रमाण पंजाबी गुरु ग्रन्थ साहिब के राग ‘‘सिरी‘‘ महला 1 पृष्ठ नं. 24 पर

एक सुआन दुई सुआनी नाल, भलके भौंकही सदा बिआल।
कुड़ छुरा मुठा मुरदार, धाणक रूप रहा करतार।।1।।
मै पति की पंदि न करनी की कार। उह बिगड़ै रूप रहा बिकराल।।
तेरा एक नाम तारे संसार, मैं ऐहा आस एहो आधार।
मुख निंदा आखा दिन रात, पर घर जोही नीच मनाति।।
काम क्रोध तन वसह चंडाल, धाणक रूप रहा करतार।।2।।
फाही सुरत मलूकी वेस, उह ठगवाड़ा ठगी देस।।
खरा सिआणां बहुता भार, धाणक रूप रहा करतार।।3।।
मैं कीता न जाता हरामखोर, उह किआ मुह देसा दुष्ट चोर।
नानक नीच कह बिचार, धाणक रूप रहा करतार।।4।।

अर्थात मन रूपी कुत्ता और उसके साथ दो आशा व तृष्णा रूपी कुतिया भौंकती रहती है तथा नित नई नई आशाएं उत्त्पन्न होती रहती हैं। इसे मारना केवल सत्यसाधना से ही सम्भव था जिसका कबीर साहेब से ज्ञान प्राप्त करके समाधान हुआ। नानक जी ने आगे कहा कि उस सत्य साधना के बिना न तो साख थी और न ही सही भक्ति कमाई थी। नानक जी कबीर परमात्मा को सम्बोधित करते हुए कहते हैं कि तुम्हारा एक नाम मन्त्र इस संसार से मुक्ति दिलाएगा मेरे पास केवल तेरा ही नाम और तू ही आधार है अन्य कुछ भी नहीं। पहले अनजाने में निंदा भी की होगी क्योंकि बहुत काम क्रोध इस चंडाल रूपी तन में रहते हैं। नानक जी कहते हैं कि मुझे धाणक रुपी परमात्मा ने आकर तार दिया और काल से छुटाया।

God kabir sahib and guru nanak dev
इस सुंदर परमात्मा की मोहिनी सूरत को कोई नहीं पहचान सकता। परमात्मा ने तो काल को भी ठग लिया है जो दिखता तो धाणक है और ज़िंदा बन जाता है। आम व्यक्ति इसे नहीं पहचान सकता इसलिए प्रेम से नानक जी ने परमात्मा की ठगवाड़ा कहा है। नानक जी जीव को अपनी भूल बताते हुए कहते हैं कि मैंने परमात्मा से वाद विवाद किया फिर भी परमात्मा ने एक सेवक रूप में मुझे दर्शन दिए और स्वामी नाम से सम्बोधित किया। नानक जी क्षमाप्रार्थी होकर पश्चाताप करते हुए कहते हैं कि मुझ जैसा नीच और हरामखोर कौन होगा। नानक जी कहते हैं कि मैं भली तरह सोच विचार कर कहता हूं कि परमात्मा यही धाणक रूप है।

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