गुरु_का महत्व

#नित्यनियम_का_सरलार्थ_गुरुदेव_का_अंगवाणी 
●●●#गुरु_का_चुनाव_कैसे_करें●●●●●●●●
 यथार्थ भक्ति बोध पुस्तक से :-
गरीब, प्रपट्टन की पीठ में, सतगुरु ले गया साथ। 
जहां हीरे मानिक बिकै, पारस लाग्या हाथ।।68 
➡️ सरलार्थ :- परलोक में जाने के लिए जिस पीठ (बाजार) पर मुझे सतगुरु साथ लेकर गए, वहीं पर हीरे-मोती भी बिक रहे थे। यहाँ पर हीरे-मोती का भावार्थ हैं कि स्वर्ग में देव पद यह तो मोती जाने तथा ब्रह्मलोक में देव पद हीरे जानें। भावार्थ है कि हम अपनी भक्ति कमाई (धन) से देव-पद भी प्राप्त कर सकते थे। अन्य भक्त ऐसा कर रहे थे, परंतु मेरे हाथ तो पारस लग गया। पारस का तात्पर्य सार शब्द (सार नाम) जिससे स्वयं तो महिमावान हुआ हो, अन्य भक्तों को भी पारस रुपी सारनाम व सत्यनाम देकर भक्ति धन के धनी बनाए। पारस एक पत्थर जैसा होता है, यदि पारस पत्थर से लोहे का गॉर्टर एक सिरे से स्पर्श हो जाए तो पूरा गॉर्टर (चाहे 15 फुट लम्बा हो) सोना (स्वर्ण) बन जाता है। मुझे पारस पत्थर जैसा मोक्ष मन्त्र मिला जिससे सत्यलोक परम पद मिला, फिर कभी जन्म-मरण नहीं होगा।
चार मुक्ति जहाँ चम्पी करती, माया हो रही दासी। 
दास गरीब अभय परशे, मिले राम अविनाशी।। 
इस प्रकार वाणी संख्या 68 का अर्थ है।

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