माया मोह!
" कबीर, एक मोह के कारने, भरत धरी दुइ देह ।
ते नर कैसे छुटि है, जिनके बहुत सनेह ।।"
इसी माया - मोह के कारण भरत को पुनः जनम लेकर दो बार शरीर धारण करना पड़ा ।
कोई मनुष्य जो संसार से अधिक स्नेह करता है वह कैसे इस संसार के बंधन से बच सकता है ।
प्रस्तुत दोहे का अर्थ निम्न कथा पढ़ने पर ही अच्छी तरह से समज मे आयेगा ...
पुराणों में वर्णित कथा :-
कथा ब्रह्मा जी जब जीव की उत्पत्ति करने लगे तब ब्रह्माजी के शरीर से एक नर- नारी , मनु और सतरूपा प्रकट हुए । जिनकी पाँच संतान थी , दो पुत्र और तीन पुत्री , जिनमे बड़े बेटे का नाम " उत्तानपाद " , और दूसरे बेटे का नाम " प्रियव्रत " था , इन्ही प्रियव्रत के वंश में एक राजा हुए जिनका नाम था " भरत " .
भरत वर्ष में तीन भरत हुए , एक राजा दशरथ के , दूसरे शकुंतला के पुत्र भरत और तीसरे प्रिय व्रत के वंश के भरत ये उन्ही का चरित्र है
राजा भरत को एक बार वैराग्य हो गया , उन्होंने अपने बड़े बेटे का राज्य अभिषेक किया और स्वयं वैरागियो की भाती सब कुछ छोड़कर गन्डगी नदी के किनारे कुटिया में रहने लगे , प्रतिदिन गन्डगी नदी में स्नान करके अपनी कुटीया में आते थे और चौबीसो घंटे शालिग्राम भगवान की सेवा किया करते थे , यही उनका नियम था , सारी उम्र सेवा भक्ति में बिता दी । एक दिन गन्डगी नदी में स्नान कर रहे थे , यकायक उन्होंने देखा की एक हिरणी पानी पीने नदी के किनारे आई , तभी उसने एक शेर की दहाड़ सुनी , अपनी जान बचाने के लिए उसने जैसे ही नदी के उस पार छलाग लगाई , हिरणी गर्भवती थी . तो योनी द्वार से उसका बच्चा हिरन शावक नदी में गिर गया , और हिरणी नदी के उस पार जाकर मर गई . अब उसका शावक पानी में डूबने लगा . भरत जी सब देख रहे थे उन्होंने सोचा इस की माँ तो मर गई है यदि मैने इसे ना बचाया तो यह मर जायेगा , उनके दिल में दया आ गयी , झट से उन्होंने उस डूबते हुए शावक को उठाया और उसे अपनी कुटिया में ले आये , उनके मन में विचार आया की ये अभी - अभी पैदा हुआ है , कुछ दिन इसे अपने पास रख कर फिर जब ये चलने , खाने लायक हो जायेगा , तो इसे छोड दूंगा ।
अब वे दिन रात उसकी सेवा करने लगे । उसके लिए हरी - हरी घास लाकर खिलाते , उसे नहलाते , सुलाते सारा दिन उसी की देखभाल में निकल जाता , जब से वह हिरण का बच्चा आया , तब से शालिग्राम भगवान की सेवा छूट गयी , जिस भगबान के लिए सब कुछ छोडकर वन में आये थे एक हिरण के बच्चे के मोह में उस भगवान को भी भूल गए । एक दिन हिरनो का एक झुड़ आया और वह बच्चा उनके साथ चला गया । भरत जी ने उसे सब कही ढूँढा पर वह कही नहीं मिला , अब जब से वह हिरन का बच्चा गया भरत जी का कही मन ही नहीं लगता था हर पल बस उसी के बारे में सोचते रहते थे , हाय ! पता नहीं उसने घास खाई भी होगी की नहीं , वह कहाँहोगा , कही वन के अन्य जीव उसे मार ना दे , बस इसी तरह के विचार उन्हें आते रहते थे , और जब उनका अंतिम समय आ गया , तो अंत समय में भी बस उसी को याद करते - करते उन्होंने प्राण त्यागे ।
और " अंत मति सा गति " अर्थात मरते समय व्यक्ति के मन में जैसे विचार आते है वैसे ही उसका दूसरा जन्म होता है । हिरन के बच्चे को याद करते मरे तो अगला जन्म गंदमादन पर्वत पर एक हिरनी के गर्भ से हुआ , पर पिछले जन्म में किया तप से , इन्हें अपना पिछला जन्म याद रहा , और ये एहसास हुआ की हाय ! ये मैने क्या किया उम्र भर भगवान की सेवा करने बाद एक हिरण के बच्चे के मोह में पड़कर अपना पिछला जन्म खो दिया , और उसे याद करते मरा तो ये जन्म भी हिरन के रूप में ही मिला , अब तो वे बिचार करने लगे की कैसे भी ये योनी छूट जाये , जैसे - तैसे वह हिरन की योनी छूटी , तीसरा जन्म एक अंगिरा गोत्री ब्राहम्ण इन्हें अपने दोनों जन्म याद थे , घर हुआ , सात भाइयो में ये सबसे छोटे थे । पिता इनसे गायत्री मंत्र याद करने के लिए कहते थे पर ये याद नहीं करते थे , की अगर इसमें आसक्ति हो गयी तो फिर जन्म विगङ जायेगा , जब इनके माता पिता की मृत्यु हो गई तो इनके भाई , भाभी इन्हें दुख देने लगे ।
खाना नहीं देते थे , पर जो भी रुखी - सूखी मिल जाये , उसे पानी में गला कर उसी को भगवान का प्रसाद समझकर खा लेते थे , और किसी चीज में आसक्ति ना हो जाये इसलिए ऐसे रहते थे जैसे ना इन्हें कुछ देखाई देता है और न सुनाई देता हो , इसलिए लोग इन्हें " जड़ भरत " कहते थे , इस जन्म में इन्होने ऐसा कोई काम नहीं किया की किसी जीव या निर्जीव से मोह हो जाये । एक बार इनके भाई ने इनसे कहा कि तुम काम धाम तो कुछ करते नहीं जाओ और खेतों कि रखवाली करो । भाई कि आज्ञा मान भरत जी खेत पर गए और पशु पछियों को भगाने लगे पर कुछ देर बाद मन में विचार आया कि ये खेत किसके है इस जगत में जितनी भी वस्तुएँ है वे सब परमात्मा कि ही तो है । और पशु पछियो में भी वही परमात्मा है । फिर जब खेत प्रभु के पशु पछी भगवान के तो मै क्यों इन्हें रोक रहा हूँ ? ऐसा विचार आते ही बुला बुलाकर खिलाने लगे - कि " हरि कि चिडियों हरि के खेत कहो मेरी चिडियों भर भर पेट ' जब इनके भाईयो को पता चला तो उन्होंने इन्हें निकाल दिया । चलते चलते एक वन में पहुँच गए वहाँ जब एक पेड़ के नीचे बैठे थे तभी राजा कि पालकी निकली जो कपिल मुनि के आश्रम ज्ञान पाने जा रहा था तभी पालकी में एक कहार कि जरुरत थी दो व्यक्ति भरत जी को पकड़कर ले गए और पालकी में लगा दिया भरत जी विरक्त संत संतो का चलाना भी निराला भरत जी ने देखा चीटियों कि लंबी कतार जा रही है कही पैर के नीचे न आ जाये इसलिए जोर से छलाग लगाई पालकी में बैठे राजा का सिर पालकी के पाटी से टकरा गया , जब दो तीन बार ऐसा हुआ तो राजा ने कहा रे कहार तू तो जीते जी मारे हुए के समान है . और भी अनाप शनाप कहने लगा , इस प्रकार कि कच्ची बुद्धि देखकर भरत जी मुस्कुराये और बिना किसी अभिमान के बोले - यदि भार नाम कि कोई चीज है तो ढोने वाले के लिए पर्याप्त है लेकिन यह तो शरीर के लिए है आत्मा के लिए नहीं आदि व्याधि भय क्रोध बुढ़ापा निंद्रा आदि देहाभिमानियो में होते है मुझमे इसका लेश भी नहीं है . जब राजा ने ऐसे इनके उपदेश सुने तो राजा को लगा कि ये कोई साधारण पुरुष नहीं है पालकी से उतारकर प्रणाम किया और भरत जी से उपदेश लिया । फिर अंत समय में भरत भगवान को प्राप्त हुए . सार राजा भरत ने एक हिरन के बच्चे से मोह लगाया तो तीन जन्म बिगड़ गए यहाँ तक की उन्हें स्वयं हिरन बनना पड़ा ।
हम तो ना जाने कहाँ - कहाँ मोह बाँधे हुए है, फिर हमारी क्या गति होगी ?
इसलिए कबीर साहेब जी कहते है
" कबीर, एक मोह के कारने, भरत धरी दुइ देह ।
ते नर कैसे छुटि है, जिनके बहुत सनेह ।।"
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