मुनिन्द्र ऋषि

श्री लंका ( सिंहल ) में चन्द्रविजय नाम से एक भाट था वो शिव जी का उपासक था । एक दिन मुनिन्द्र ऋषि नलनील के गुरूदेव श्री लंका गये चन्द्रविजय ने संत को देखकर प्रणाम सत्कार किया बोला हे ऋषिवर दास की कुटिया पर पधारे  हमें आपकी सेवा का सुअवसर मिले । 

 मुनिन्द्र ऋषि बोले हे चन्द्रविजय मै सिर्फ उन के घर जाता हुं जो परमेश्वर की भक्ति करते है चंद्रविजय बोला महाराज मै शिव का उपासक हुं और पुरा श्री लंका (सिंहल) शिव की आराधना करता है स्वयं लंकापति भी शिव के भक्त है । फिर मुनिन्द्र ऋषि ने सृष्टी रचना सुनाई कि बह्मा विष्णु शिव की उत्पति से पुर्व का सारा ज्ञान दिया चंद्रविजय कुछ देर मुंह बनाता रहा फिर धीरे धीरे वह ज्ञान उसके हदय में घर कर गया और उसने मुनिन्द्र ऋषि को गुरू बनाकर उपदेश ले लिया |

फिर मुनिन्द्र ऋषि उसके घर गये तब उसकी पत्नी कर्मवति ने भी ज्ञान सुन उपदेश ग्रहण कर लिया |
 अब कर्मवति चंद्रविजय की पत्नी रोज महारानी मंदोदरी के मनोरंजन के लिये चुटकुले और हंसी ठहाके की बाते सुनाकर मन बहलाया करती थी वो अगले दिन गयी तो उसने वही मुनिन्द्र ऋषि वाला ज्ञान महारानी मंदोदरी को सुनाया यह ज्ञान सुन मंदोदरी बडी प्रभावित हुयी और कर्मवति को कहा अबके आप के गुरू पधारे तो मुझे बताया मै भी उन के दर्शन का लाभ ले सकु । 

अगली बार मुनिन्द्र ऋषि आये तो कर्मवति ने गुरूदेव को सारी बात बताई गुरूदेव‌ ने कहा महारानी को कहना कि संतो के चरणो में स्वयं जाया करते है 

कबीर , संत मिलन को चालिये , तज माया अभिमान । 
         ज्यो ज्यो पग आगे धरे , सौ सौ यज्ञ समान ।।

कर्मवति ने महारानी मंदोदरी को बताया आप स्वयं पधार‌कर संत सेवा का लाभ लिजिये । मंदोदरी अपने कुछ सैनिक और दासियो संग चंद्रविजय भाट के घर जाकर ऋषिवर को प्रणाम किया और कर्मवति से ज्ञान तो सुन रखा था तो उपदेश लिया और महल लौट आई और रावण को यह ज्ञान बताया रावण को बडा क्रोध आया कि मैं शिव का उपासक और तू मुझे शिव से बडा कोई और बता रही है देख मेरे शिव ने सोने की लंका में कितने ठाठ कर रखे है और आगे से यह बाते मेरे आगे मत दोहराना । 
 महारानी चुप हो गयी फिर यह ज्ञान विभिषण को सुनाया   विभिषण ने भी कहा आप यह ज्ञान‌ भैय्या को मत बताना न जाने आप पर कितना क्रोध‌ कर जाये 
 समय आने पर विभिषण ने भी मुनिन्द्र ऋषि का उपदेश लिया । 

आप लोगो ने वही रामायण देखी समझी है जो टीवी पर दिखाई गयी है । मुनिन्द्र ऋषि के बिना पुरी रामायण ही अधूरी है पर कहीं जिक्र ही नही ।
 
गरीब , जगत का पेख्ना पेखिया , धनी का नाम ना लेखा 

।। https://youtu.be/EY01iI1RKQU 
(सत्संग लिंक)

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