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Showing posts from May, 2024

अलल पंख पक्षी और चन्डूल पक्षी

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.                                    अलल पक्षी और चन्डूल पक्षी दो ऐसे दुर्लभ पक्षी है जो संभवत संसार में कुछ ही लोग देख पाते होंगे इनमें चन्डूल पक्षी तो खैर काफ़ी लोंगो ने देखा होगा फ़िर भी इसे देखने वालों की संख्या अधिक नहीं होती।       चन्डूल पक्षी की खासियत ये होती है कि ये किसी भी आवाज की नकल कर लेता है चाहे वह पुरुष महिला या किसी जानवर या अन्य पक्षी या अन्य कोई भी जो आवाज है जैसी आवाज है उसकी वखूबी नकल कर लेता है। इसकी इस मक्कारी की वजह से कई बार लोग जंगलों में मुसीवत में पङ गये क्योंकि इसने उन्ही में से किसी की आवाज की नकल कर अथवा कोई अन्य इतर आवाज वनाकर लोगों को भ्रमित किया इसी लिये चान्डाल स्वभाव का मानने के कारण इसका नाम चन्डूल रखा गया।         एक अनल पक्षी (अलल पंख) आकाश में रहता था। यह पक्षी अब लुप्त हो चुका है। इसके चार पैर होते थे। आगे वाले छोटे और पीछे वाले बड़े। इसका आकार बहुत बड़ा होता था। लम्बे-लम्बे पंख होते थे। पूरा पक्षी यानि युवा पक्षी चा...

💐 *मंशूर अली की कथा* 💐

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📜मंशूर प्रतिदिन आश्रम में जाने लगा। ‘‘अनल हक’’ मंत्र को बोल-बोलकर जाप करने लगा। मुसलमान समाज ने विरोध किया। कहा कि मंशूर काफिर हो गया। परमात्मा को मानुष जैसा बताता है। पृथ्वी पर आता है परमात्मा, ऐसा कहता है। अनल हक का अर्थ गलत करके कहते थे कि मंशूर अपने को अल्लाह कहता है। इसे जिंदा जलाया जाए या अनल हक कहना बंद कराया जाए। मंशूर राजा का लड़का था। इसलिए किसी की हिम्मत नहीं हो रही थी कि मंशूर को मार दे। यदि कोई सामान्य व्यक्ति होता तो कब का राम नाम सत कर देते। नगर के हजारों व्यक्ति राजा के पास गए। राजा को मंशूर की गलती बताई। राजा ने सबके सामने मंशूर को समझाया। परंतु वह अनल हक-अनल हक का जाप करता रहा। उपस्थित व्यक्तियों से राजा ने कहा कि जनता बताए कि मंशूर को क्या दण्ड दिया जाए? जनता ने कहा कि मंशूर को चौराहे पर बाँधकर रखा जाए। नगर का प्रत्येक व्यक्ति एक-एक पत्थर जो लगभग आधा किलोग्राम का हो, मंशूर को मारे तथा कहे कि छोड़ दे काफर भाषा। यदि मंशूर अनल हक कहे तो पत्थर मारे, आगे चला जाए। दूसरा भी यही कहे। तंग आकर मंशूर अनल हक कहना त्याग देगा। नगर के सारे नागरिक एक-एक पत्थर लेकर पंक्ति बनाकर खड़े...

माया मोह!

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" कबीर, एक मोह के कारने, भरत धरी दुइ देह ।  ते नर कैसे छुटि है, जिनके बहुत सनेह ।।"  इसी माया - मोह के कारण भरत को पुनः जनम लेकर दो बार शरीर धारण करना पड़ा ।  कोई मनुष्य जो संसार से अधिक स्नेह करता है वह कैसे इस संसार के बंधन से बच सकता है ।  प्रस्तुत दोहे का अर्थ निम्न कथा पढ़ने पर ही अच्छी तरह से समज मे आयेगा ...  पुराणों में वर्णित कथा :- कथा ब्रह्मा जी जब जीव की उत्पत्ति करने लगे तब ब्रह्माजी के शरीर से एक नर- नारी , मनु और सतरूपा प्रकट हुए । जिनकी पाँच संतान थी , दो पुत्र और तीन पुत्री , जिनमे बड़े बेटे का नाम " उत्तानपाद " , और दूसरे बेटे का नाम " प्रियव्रत " था , इन्ही प्रियव्रत के वंश में एक राजा हुए जिनका नाम था " भरत " .  भरत वर्ष में तीन भरत हुए , एक राजा दशरथ के , दूसरे शकुंतला के पुत्र भरत और तीसरे प्रिय व्रत के वंश के भरत ये उन्ही का चरित्र है राजा भरत को एक बार वैराग्य हो गया , उन्होंने अपने बड़े बेटे का राज्य अभिषेक किया और स्वयं वैरागियो की भाती सब कुछ छोड़कर गन्डगी नदी के किनारे कुटिया में रहने लगे , प्रतिदिन गन्डगी नदी में स्ना...

कविर्देव (कबीर परमेश्वर)

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सृष्टि रचना :- Part -1 {कविर्देव (कबीर परमेश्वर) ने सूक्ष्म वेद अर्थात् कबिर्बाणी में अपने द्वारा रची सृष्टि का ज्ञान स्वयं ही बताया है जो निम्नलिखित है} सर्व प्रथम केवल एक स्थान ‘अनामी (अनामय) लोक‘ था। जिसे अकह लोक भी कहा जाता है, पूर्ण परमात्मा उस अनामी लोक में अकेला रहता था। उस परमात्मा का वास्तविक नाम कविर्देव अर्थात् कबीर परमेश्वर है। सभी आत्माएँ उस पूर्ण धनी के शरीर में समाई हुई थी। इसी कविर्देव का उपमात्मक (पदवी का) नाम अनामी पुरुष है (पुरुष का अर्थ प्रभु होता है। प्रभु ने मनुष्य को अपने ही स्वरूप में बनाया है, इसलिए मानव का नाम भी पुरुष ही पड़ा है।) अनामी पुरूष के एक रोम (शरीर के बाल) का प्रकाश शंख सूर्यों की रोशनी से भी अधिक है। विशेष :- जैसे किसी देश के आदरणीय प्रधान मंत्री जी का शरीर का नाम तो अन्य होता है तथा पद का उपमात्मक (पदवी का) नाम प्रधानमंत्री होता है। कई बार प्रधानमंत्री जी अपने पास कई विभाग भी रख लेते हैं। तब जिस भी विभाग के दस्त्तावेजों पर हस्त्ताक्षर करते हैं तो उस समय उसी पद को लिखते हैं।  जैसे गृहमंत्रालय के दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करेगें तो अपने को गृह मंत...

*निरंजन धन तुम्हरो दरबार*

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*निरंजन धन तुम्हरो दरबार* ********************** निरंजन धन तुम्हरो दरबार । जहाँ न तनिक न्याय विचार ।। रंगमहल में बसें मसखरे, पास तेरे सरदार । धूर-धूप में साधो विराजें, होये भवनिधि पार ।। वेश्या ओढे़ खासा मखमल, गल मोतिन का हार । पतिव्रता को मिले न खादी सूखा ग्रास अहार ।। पाखंडी को जग में आदर, सन्त को कहें लबार । अज्ञानी को परम‌ ब्रहम ज्ञानी को मूढ़ गंवार ।। साँच कहे जग मारन धावे, झूठन को इतबार । कहत कबीर फकीर पुकारी, जग उल्टा व्यवहार ।। निरंजन धन तुम्हरो दरबार ।       सृष्टि रचना :- Part -2 ”आत्माएँ काल के जाल में कैसे फँसी?“ विशेष :- जब ब्रह्म (ज्योति निरंजन) तप कर रहा था हम सभी आत्माएँ, जो आज ज्योति निरंजन के इक्कीस ब्रह्माण्डों में रहते हैं इसकी साधना पर आसक्त हो गए तथा हृदय से इसे चाहने लगे। अपने सुखदाई प्रभु सत्य पुरूष से विमुख हो गए। जिस कारण से पतिव्रता पद से गिर गए। पूर्ण प्रभु के बार-बार सावधान करने पर भी हमारी आसक्ति क्षर पुरुष से नहीं हटी। {यही प्रभाव आज भी काल सृष्टि में विद्यमान है। जैसे नौजवान बच्चे फिल्म स्टारों (अभिनेताओं तथा अभिनेत्...